Wednesday, 28 June 2017

अंशु जमसेंपा


यूं तो हर कोई कहता है कि महिलाएं पुरुषों के बराबर होती हैं, लेकिन इस देश में ऐसी महिलाएं भी हैं, जिन्होंने यह साबित किया है कि महिलाएं पुरुषों के बराबर नहीं, बल्कि उनसे बढ़कर हैं। ऐसी ही एक महिला हैं– अरुणाचल प्रदेश की अंशु जमसेंपा। पर्वतारोही अंशु ने अपनी काबिलियत के दम पर पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन किया है।
हाल ही में अंशु ने महज 118 घंटे में 2 बार दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा फहराकर कीर्तिमान स्थापित किया है। ऐसा करने वाली वे दुनिया की पहली महिला बन गई हैं। अंशु ने अपने जीवन में हमेशा एक लक्ष्य पाने के बाद बिना रूके दूसरे लक्ष्य की तरफ कदम बढ़ाया है। उनके हौसले इनकी उम्र से बहुत बड़े हैं। अंशु पहले भी वर्ष 2011 में 10 दिन के अन्दर 2 बार एवरेस्ट फतेह करने का करिश्मा कर चुकी हैं । वर्ष 2013 में उन्होंने नेपाल के दुर्गम पहाडों की ओर से चढ़कर एवरेस्ट पर कदम रखा। पिछले वर्ष मई महीने में उन्होंने हिमालय की तीन दुर्गम चोटियों को केवल 6 दिन में फतह करने का रिकॉर्ड अपने नाम किया । ये चोटियां थीं- लोबचे (6119 मीटर), पोकल्दे (5896 मीटर) और आइलैंड (6189 मीटर)। नेपाल सरकार ने उनकी इस उपलब्धि के लिए उन्हें सम्मानित किया है।
पांचवीं बार चढ़ाई शुरू करने से पहले अंशु के शब्द थे– ‘मेरा लक्ष्य अब माउंट एवरेस्ट पर फिर तिरंगा फहराने और भगवान बुद्ध को नमन करने का है।’ इस तरह अंशु ने 5 बार 8,850 मीटर ऊंचे एवरेस्ट को फतेह करने का गौरव हासिल कर लिया है।

अंशु देश की महिलाओं के लिए एक जीता जागता आदर्श हैं। उनकी विजय इसलिए भी खास है कि उन्होंने अपने परिवार की सभी जिम्मेदारियों को निभाते हुए ये मुकाम हासिल किया है। आमतौर पर शादी के बाद जहाँ महिलाएं अपनी आशाएं और सपने भुला देती हैं वहीं अंशु ने दो बच्चों की माँ होने के बावजूद इस कठिन लक्ष्य को प्राप्त किया और पूरे देश का नाम रोशन किया ।  

झूम खेती


भारत के उत्तरपूर्वी राज्यों में झूम खेती की प्राचीन परम्परा है। इन प्रदेशों के लोग सदियों से पहाड़ों पर सीढ़ीनुमा खेतों में इस तरह की खेती करते हैं। झूम खेती कई मायनों में अन्य कृषि पद्धतियों से अलग है। इसमें किसान किसी एक ऐसे जमीन के टुकड़े को चुनता है, जहाँ पिछले 4-5 सालों से खेती न हुई हो। उस दौरान उगे हुए पौधों और खरपतवार को वहीं उसी खेत में जला दिया जाता है। किसानों का यह विश्वास है कि उन पौधों की बची हुई राख उस जमीन में उर्वरक का कार्य करती है। यहाँ के किसान उन खेतों को जोतते नहीं है, बल्कि बहुत हल्का हल्का खोदकर बीज छिड़क देते हैं।  किसान उस जगह 2 से 4 बार सब्जी और धान जैसी फसलें उगाते हैं। उसके बाद जब धीरे–धीरे उस जगह की उर्वरा शक्ति कम होने लगती है तो किसान उस जमीन को छोड़कर दूसरी जगह फिर से वही प्रक्रिया दोहराते हैं। फिर 4-5 साल के लिए उस जमीन को ऐसे ही छोड़ दिया जाता है।

इस तरह झूम खेती में किसानों को फसल के लिए जगह बदलते रहना पड़ता है। इन खेतों में सिचाई को लेकर भी बहुत सावधानी बरती जाती है। वही फसलें उगाई जाती हैं जिनमें बार–बार पानी की जरूरत न हो। सीढ़ीनुमा खेतों की हर सीढ़ी को समतल बनाया जाता है, ताकि सभी खेतों में उनकी जरूरत का पानी रुक सके।

पहाड़ी क्षेत्रों में लोकप्रिय होने के बावजूद आजकल पर्यावरणविद झूम खेती पर सवाल उठाने लगे हैं।  इस खेती से पर्यावरण को काफी नुकसान होता है। एक ओर भूमि के जलने से उसकी उर्वरा शक्ति क्षीण होती है, वहीं दूसरी ओर बार–बार इसके लिए खरपतवार जलाने से वातावरण में प्रदूषण फैलता है। ऐसा देखा गया है कि कुछ राज्यों में इसके लिए जंगल भी जलाए जाते हैं। अतः सरकार द्वारा इस खेती पर बैन भी लगाया गया है। 

स्वामी दयानन्द सरस्वती


स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्म 12 फरवरी, 1824 को गुजरात के टंकारा जिले में हुआ। इनका नाम बचपन में मूलशंकर था । इनके पिता कर्षण जी पेशे से कलेक्टर थे और माँ यशोदा बाई गृहिणी थी । मूलशंकर ने 12 वर्ष की आयु तक घर में रहकर ही पिता से शिक्षा प्राप्त की।
स्वामी जी के जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिनके कारण उन्होंने सामाजिक मान्यताओं पर प्रश्न करना शुरू कर दिया। अपनी छोटी बहन और सबसे ज्यादा प्यार करने वाले अपने चाचा की हैजे के कारण मृत्यु देखने के बाद वे बचपन में ही अंदर तक टूट गए और जीवन के इस भयावह सत्य को जानने के लिए व्याकुल हो उठे। उनके प्रश्न और कठिन हो चले थे, जिनका उत्तर उनके माता–पिता भी न दे पाते थे। अन्त में पिता ने आस्था का मार्ग खोजा और मूलशंकर को शिवशंकर का महत्त्व समझाया और शिवरात्रि पर व्रत करने को कहा। मूलशंकर ने सोचा कि शिवरात्रि पर शिव को प्रसन्न करके उन्हीं से प्रश्नों का उत्तर मांगूंगा। उन्होंने शिवरात्रि में पिता के साथ सारी तैयारियां करवायी और व्रत भी रखा। जैसे–जैसे रात नजदीक आई, बालक की उत्सुकता और बढ़ती गई। रात को मन्दिर में भजन–कीर्तन होने लगे। लगभग एक पहर बीत जाने के बाद सब धीरे–धीरे सोने लगे, पर मूलशंकर की उत्सुकता कम नहीं हुई। वो जाप करते हुए शिव के प्रकट होने की प्रतीक्षा कर रहे थे, कि तभी उन्होंने देखा कि मन्दिर के एक कोने से कुछ चूहे निकलकर आए और मन्दिर में उत्पात मचाने लगे। शिवलिंग पर चढ़कर मलमूत्र किया और लगाया हुआ भोग भी सारा खराब कर दिया। यह देख मूलशंकर से रहा न गया। उन्होंने झट से पिता को उठाकर पूछा कि ‘पिता जी, क्या सच में यही सच्चा शिव है, जो स्वयं अपनी रक्षा भी नहीं कर पा रहा।’
पिता ने बालक को डांटते हुए चुप करा दिया। लेकिन ये बात मूलशंकर के मन में बैठ गई कि वो सच्चे शिव को खोजकर रहेंगे।
कुछ समय बाद अवसर देखकर मूलशंकर घर से निकल भागे और मठ–मन्दिरों में घूम–घूमकर शिव की खोज करते रहे। इस दौरान एक मन्दिर में स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती ने उन्हें संन्यास की दीक्षा देकर स्वामी दयानन्द सरस्वती नाम प्रदान किया।
कई वर्षों तक ज्ञान की खोज में भटकने के बाद एक दिन वे मथुरा पहुंचे। मथुरा में स्वामी दयानन्द ने विरजानन्द दण्डी से भेंट कर अध्ययन की इच्छा प्रकट की।  विरजानन्द जी ने उन्हें शिष्य के रूप में स्वीकार कर 3 वर्ष तक शिक्षित किया। वेद, उपनिषद्, दर्शन आदि की शिक्षा पूरी करने पर जब स्वामी दयानन्द ने गुरुदक्षिणा देनी चाही तो विरजानन्द जी ने समाज हित में उनका जीवन ही मांग लिया। स्वामी दयानन्द ने सहर्ष ही गुरू का यह आदेश स्वीकार कर लिया। वे पूरे देश में घूम घूमकर वैदिक धर्म का प्रचार करने लगे और लोगों को समाज में व्याप्त कुरीतियों से सावधान करने लगे।
स्वामी दयानन्द की मान्यता थी कि वेद ईश्वरीय ज्ञान है और हम सबको वेदों के अनुसार ही जीवन जीना चाहिए। उन्होंने समाज को एक नारा दिया – ‘वेदों की ओर लौटो।’
स्वामी दयानन्द समाज में एक क्रान्ति बनकर सामने आए। उनका चिन्तन धर्म तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने भारत की आजादी के लिए भी लोगों को प्रेरित किया। स्वामी जी के प्रवचनों ने देश की आजादी में नींव का काम किया। स्वामी जी की प्रेरणा से ही लाला लाजपत राय, विनायक दामोदर सावरकर, श्यामजी कृष्ण वर्मा और रामप्रसाद बिस्मिल जैसे क्रान्तिकारियों ने देश के लिए अपनी कुर्बानी दी। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने उन्हें ‘आधुनिक भारत का निर्माता’ कहा है।
शिक्षा के क्षेत्र में स्वामी जी का योगदान अविस्मरणीय है। स्वामी जी की प्रेरणा से ही लाला हंसराज ने लाहौर में डीएवी (दयानन्द एंग्लो वैदिक) का̆लेज की स्थापना की। भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए स्वामी जी के शिष्य श्रद्धानन्द सरस्वती ने हरिद्वार में गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना की। इस प्रकार प्राचीन और आधुनिक दोनों ही शिक्षा पद्धतियों के संवर्धन में स्वामी जी का योगदान अमूल्य है।
शिक्षा और धर्म के प्रचार के लिए स्वामी जी ने सन् 1875 में मुंबई में आर्यसमाज की स्थापना की। समाज को बौद्धिक विरासत देने के लिए उन्होंने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ जैसे अमर ग्रन्थ का प्रणयन किया। इस पुस्तक में प्रश्नोत्तर शैली में 14 अध्यायों (समुल्लास) में धर्म, दर्शन, ईश्वर जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई है। इसमें 3000 से ज्यादा संदर्भ दिए गए हैं, जिसके कारण यह पुस्तक स्वयं में एक बड़े शोध ग्रन्थ से कम नहीं है।
स्वामी दयानन्द जहाँ भी जाते, लोग उनके व्याख्यान के दीवाने हो जाते थे। लेकिन प्रसिद्धि अपने साथ शत्रुओं को भी जन्म देती है। राजस्थान के जोधपुर में एक वेश्या ने उनके रसोइए के साथ मिलकर उन्हें जहर दे दिया और सन् 1883 में दीपावली के दिन स्वामी जी इस धरा को छोड़कर चले गए। उनके अन्तिम शब्द थे– ‘प्रभु, तूने अच्छी लीला की। तेरी इच्छा पूर्ण हो’।

अरुणाचल प्रदेश


अरुणाचल प्रदेश भारत का एक उत्तर–पूर्वी राज्य है। ‘अरुणाचल’ का अर्थ है, ‘उगते सूरज का पर्वत’। इसकी राजधानी ‘ईटानगर’ है। यहाँ के लोग असमिया और हिन्दी बोलते हैं। इसके दक्षिण में असम, दक्षिणपूर्व में नागालैंड, पूर्व में म्यांमार, उत्तर में तिब्बत और पश्चिम में भूटान है।
अंग्रेजी राज में, अरुणाचल प्रदेश को पूर्वोत्तर सीमांत एजेंसी (नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी–नेफा) कहा जाता था। तब यह असम राज्य का ही हिस्सा था। इसके सामरिक महत्त्व को देखते हुए सन् 1972 में इसे केन्द्र शासित राज्य का दर्जा मिला और इसका नाम आधिकारिक रूप में अरुणाचल प्रदेश कर दिया गया। 20 फरवरी, 1987 को इसे भारतीय संघ के 24 वें राज्य के रूप में मान्यता मिली। वर्ष 1988-89 के दौरान इसे विशेष राज्य का दर्जा दिया गया ।
चारों ओर से पहाड़ों से घिरा अरुणाचल पूर्वोत्तर राज्यों में सबसे बड़ा राज्य है। बीस जिलों वाले इस राज्य में कई तरह के मौसम एक साथ देखने को मिलते हैं। तिब्बत के निकटवर्ती ऊँचाई वाले क्षेत्रों में शीत, मध्य हिमालय क्षेत्रों में समशीतोष्ण तथा निचले क्षेत्रों में नम उप उष्णकटिबंधीय मौसम पाया जाता है। यहाँ औसत से ज्यादा वर्षा होती है।
प्रदेश के 80% लोगों के जीवनयापन का मुख्य आधार कृषि है। यहाँ के लोग ‘झूम’ खेती करते हैं। यह पहाड़ी लोगों की पारंपरिक कृषि पद्धति है। अरुणाचल प्रदेश में मुख्य रूप से चावल, मक्का, बाजरा, गेहूं, जौ, दलहन, गन्ना, अदरक और तिलहन की खेती होती है। टोकरी, प्लाईवुड और मोमबत्ती निर्माण आदि यहाँ के प्रमुख कुटीर उद्योग हैं।
अरुणाचल प्रदेश में अनेक दर्शनीय स्थल हैं, जिनमें ईटा दुर्ग के अवशेष, भीष्मक नगर, परशुराम कुंड और नमदाफा अभ्यारण्य प्रमुख हैं। यहाँ ‘ईटा’ नामक एक प्राचीन एवं प्रसिद्ध किला है, जिसके नाम पर राज्य की राजधानी का नाम ‘ईटानगर’ पड़ा। इस किले का निर्माण 14-15वीं शताब्दी में कराया गया था। यहाँ का प्राकृतिक वातावरण मनमोहक है। यहाँ से कुछ ही दूरी पर ‘गंगा’ नामक एक खूबसूरत झील है। झील से सटे हरे–भरे जंगल में वन्यजीवों को घूमते हुए आसानी से देखा जा सकता है।
अरुणाचल प्रदेश में बौद्ध धर्म का अधिक प्रचार है। तवांग का बौद्ध मठ अत्यन्त प्रसिद्ध है। तिब्बती शैली में बने इस मठ की छत से पूरे ईटानगर का खूबसूरत नजारा देखा जा सकता है। इस मन्दिर में पं जवाहर लाल नेहरू के नाम से एक संग्रहालय भी मौजूद है, जिसमें पर्यटक एक जगह पर पूरे अरुणाचल प्रदेश की झलक देख सकते हैं। लकड़ियों से बनी स्थानीय सुन्दर कलाकृतियों को भी इस संग्रहालय में रखा गया है।
‘पापुम पेर’ यहाँ का प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। पर्वतीय प्रदेश होने का कारण यहाँ स्थान-स्थान पर सुरम्य पर्वत शिखर, पहाड़ी नदियां और घने जंगल देखे जा सकते हैं।
परशुराम कुंड मेला ओर मालीनीयान मेला राज्य के प्रमुख मेले हैं। इस राज्य के प्रमुख त्योहारों में सी-डोनची, सोलंग, न्योकुम, बूरी-बूट, चालो-लोकु, संगकोन, मोपीन और ओरिआ शामिल हैं। 

इफको पिकनिक 2017


भारत में प्रकृति के सौंदर्य का अनुपम खजाना है। एक ओर पर्वतराज हिमालय है तो दूसरी ओर दूर–दूर तक फैला नीला समुद्र। कहीं प्राचीन गुफाएं हैं तो सुरम्य नदियां और झरने। इस तरह भारत का हर कोना पर्टयन की दृष्टि से समृद्ध है। देश विदेश के पर्यटकों के लिए भारत एक सुनहरा विकल्प है। पिकनिक के लिए हर साल की तरह इस साल भी इफको परिवार को घुमाने की योजना बनाई गई।  इस वर्ष पिकनिक के लिए देश का हृदय कहे जाने वाले राज्य मध्यप्रदेश को चुना गया। मार्च माह के तीसरे सप्ताह में इफको के कर्मचारी और उनके परिवारजन बडी संख्या में पिकनिक के लिए ट्रेन से रवाना हुए। लगभग 5 दिनों की इस पिकनिक में भोपाल, भोजपुर और पचमढी भ्रमण का आयोजन किया गया।
भोपाल में भ्रमण की शुरुआत ‘शौर्य स्मारक’ के साथ हुई, यहाँ देश के वीरों की शौर्य गाथाएं वर्णित हैं। भूमिगत प्रदर्शनी में तीनों सेनाओं के वीरों  के चित्र तथा उनकी बहादुरी का स्वर्णिम इतिहास चित्रित है। सभी ने यहाँ एक बंद कमरें में सियाचीन जैसे कृत्रिम ठंडे माहौल में सैनिकों के जीवन का आंशिक अनुभव भी लिया ।  विशाल भूखण्ड पर स्थापित उस स्मारक स्थल में एक चित्रपटल भी बनाया गया है, जहाँ आजादी की गाथाएं फिल्म रूप में दिखाई गई हैं। सबसे अद्भुत है वहाँ का प्रमुख शौर्य स्मारक। वह देखने अनूठा है। वस्तुतः वह एक कृत्रिम स्मारक है जो की घुमावदार मीनार जैसा दिखता है। पिछले वर्ष देश के माननीय प्रधानमंत्री ने इसका उदघाटन कर इसे देश को समर्पित किया था।
उसके बाद सभी ‘बडी झील’ की ओर रवाना हुए।  बड़ी झील का विस्तार लगभग छः वर्ग कि.मी. तक है। संध्या काल में भोपाल नगर का झिलमिलाता प्रतिबिम्ब झील के जल में अद्भुत और मनोरम दृश्य बनाता है।  शाम के समय ‘क्रूज में जलपान तथा संगीत के साथ झील के भ्रमण’ का आयोजन किया गया था। सभी ने उन अविस्मरणीय पलों का आनन्द लिया।
उसके बाद भोपाल से पचमढी की ओर जाते हुए रास्ते में भोजपुर आता है। भोजपुर में प्रसिद्ध है लभगभ एक हजार साल पुराना भोजेश्वर मंदिर। कहते हैं कि उस मंदिर का निर्माण तत्कालीन राजा भोज ने करवाया था इसीलिए उसे भोजेश्वर मंदिर कहते हैं। उस मंदिर में 22 फुट ऊंचा एक विशाल शिवलिंग है, जो कि आंशिक रूप से खंडित भी है। उस मंदिर की छत भी पूरी तरह बनी हुई नहीं है। देखने से लगता है कि किसी विघ्न के कारण वह मन्दिर पूरा नहीं किया जा सका होगा।
देर शाम इफको की बसें पचमढी की पहाडियों को पार करते हुए एक होटल में पहुंची , जहाँ २ दिन तक रूकने की व्यवस्था की गई थी । रात के भोजन के दौरान संगीत संध्या का आयोजन भी किया गया था। अगले दिन पचमढी में प्राचीन गुफाएं दिखाई गई और उसके बाद अप्सरा विहार का झरना जिस तक के लिए सभी को एक लंबी पदयात्रा करनी पडी।
पिकनिक का अगला पडाव था घूपगढ,  जहाँ जाने के लिए सभी लोग जीपों में बैठकर निकल पडे। पचमढी की इस सबसे ऊंची चोटी पर पहुंचने के लिए सर्पाकार रास्तों से होते हुए पूरा काफिला धूपगढ पहुंचा। पहाडी से दूर–दूर तक फैली हरियाली के नजारे का सबने लुत्फ उठाया। संध्याकाल के सुरम्य सूर्यास्त को देखने के लिए सभी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। अन्ततः सभी ने वो दिलकश नजारा कि कैसे सूर्य नीली गुलाबी रोशनी छिटकता हुआ आसमान के दूसरे छोर में समां गया।
इस पिकनिक में सभी का खूब मनोरंजन हुआ। सभी कर्मचारियों और  उनके परिजनों ने इस अनोखे आयोजन के लिए आयोजकों  को बधाईयां और धन्यवाद दिया।



Thursday, 9 March 2017

संस्कृत और संगणक

दुनियाभर के भाषा वैज्ञानिक ये मानते हैं कि संस्कृत सिर्फ एक प्राचीनतम भाषा ही नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक भाषा भी है। गणित, चिकित्सा शास्त्र, खगोलविज्ञान आदि सभी विषयों के आदि ग्रन्थ इसी भाषा में रचे गए। भाषविदों का मानना है कि भाषाविज्ञान के समग्र अध्ययन के लिए इस भाषा का ज्ञान अनिवार्य है।
संस्कृत में अन्य खूबियों के साथ एक खूबी यह भी है कि संस्कृत संगणक अर्थात् कंप्यूटर के लिए भी उपयुक्त भाषा है। नासा से इसरो तक सभी वैज्ञानिक इस तथ्य को स्वीकार करते हैं। संस्कृत में ऐसी अनेक खूबियां है, जो उसकी वैज्ञानिकता प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं। अंग्रेजी आदि भाषाओं में एक वाक्य में आए हुए शब्दों का स्थान बदल देने  से उस वाक्य का अर्थ बदल जाता है। लेकिन संस्कृत शब्दों को कहीं भी रखा जाए, कोई फर्क नहीं पडता। वाक्य का अर्थ वही रहता है। यथा– रामः ग्रामं गच्छति (राम गांव जाता है।) को ग्रामं गच्छति रामः या फिर गच्छति  ग्रामं रामः  कहने पर  भी अर्थ परिवर्तन नहीं होता।

संस्कृत के व्याकरण पर शोध करते हुए भाषाविज्ञानिक इस निष्कर्ष तक भी पहुंच चुके हैं कि हर घर में इस्तेमाल होने वाला कंप्यूटर पाणिनि की अष्टाध्यायी( संस्कृत व्याकरण) पर ही आधारित है। संगणक भाषाविदों का मानना है कि कंप्यूटर में इस्तेमाल होने वाली भाषा और इससे बनने वाले प्रोग्राम में पाणिनि की अनुवृत्ति, अधिकार, संज्ञा और परिभाषा आदि तकनीक ही प्रयुक्त होती है। सीडैक आदि संस्थाएं इस बारे में गहन शोध कर रही हैं। इस विषय में अभी भी पर्याप्त शोध की संभावनाएं हैं  ताकि संस्कृत भाषा के महत्त्व को जानकर हम अपने पूर्वजों की विरासत पर गौरव कर सकें।

Wednesday, 8 March 2017

कौवे की परेशानी

कौवे की परेशानी
एक कौआ जंगल में रहता था और अपने जीवन से संतुष्ट था। एक दिन उसने एक हंस को देखा और अपने मन में सोचा ‘यह हंस कितना सफ़ेद है और कितना सुन्दर है’। उसे लगा कि यह हंस दुनिया में सबसे सुन्दर और सुखी पक्षी है, जबकि मैं तो कितना काला हूँ। यह सोचकर वह काफी परेशान रहने लगा और उससे रहा नहीं गया, उसने अपने मनोभाव हंस को बताए ।
हंस ने कहा – ‘वास्तिकता यह है कि पहले मैं खुद को सारे पक्षिओं से सुन्दर समझता था। लेकिन जब मैने तोते को देखा तो पाया कि उसके पास दो रंग हैं और वह बहुत ही मीठा बोलता है। तब से मुझे लगा कि पक्षिओं में तोता ही सुन्दर व सुखी है।’
अब कौआ तोते के पास गया।
तोते ने कहा – ‘मै सुखी जिंदगी जी रहा था, लेकिन जब मैंने मोर को देखा तब मुझे लगा कि मुझमें तो दो रंग ही हैं परन्तु मोर तो बहुरंगी है । मुझे तो वो ही सुन्दर और सुखी लगता है ।’
फिर कौआ उड़कर प्राणी संग्रहालय गया जहाँ कई लोग मोर देखने एकत्रित हुए थे। जब सब लोग चले गए तो कौआ उसके पास जाकर बोला – ‘मित्र, तुम तो अति सुन्दर हो, कितने सारे लोग तुम्हें देखने के लिए इकट्ठे होते हैं। प्रतिदिन तुम्‍हें देखने के लिए हजारों  लोग आते है, जब कि देखते ही लोग मुझे उड़ा देते है। मुझे लगता है कि इस धरती पर तो तुम ही सभी पक्षिओ में सबसे सुन्दर और सुखी हो।’
मोर ने गहरी सांस लेते हुए कहा – ‘मैं हमेशा सोचता था कि इस पृथ्वी पर मैं ही सबसे सुन्दर हूँ, मैं ही अतिसुखी हूँ । परन्तु मेरे सौन्दर्य के कारण ही मैं यहाँ पिंजरे में बंद हूँ। मैंने सारे प्राणियों को गौर से देखा तो मैंने जाना कि ‘तुम ही ऐसे पक्षी हो, जिसे पिंजरे में बंद नहीं किया जाता।’ मुझे तो लगता है कि काश मैं भी तुम्हारी तरह कौआ होता तो स्वतंत्रता से सभी जगह घूमता-उड़ता, सुखी रहता ।”
हम अनावश्यक ही दूसरों से अपनी तुलना किया करते है और दुखी-उदास रहते है ।  हमें जो मिला है, हमें उसकी कद्र करनी चाहिए।

Wednesday, 1 March 2017

लाला लाजपतराय

लाला लाजपतराय
लाला लाजपतराय का जन्म 28 जनवरी, 1865 को पंजाब प्रान्त के मोगा जिले में हुआ। उनकी आरंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। उनके पिता लाला राधाकृष्ण से उन्हें उर्दू और फारसी की तालीम मिली। उच्चशिक्षा के लिए वे लाहौर आ गए। उन्होंने वकालत की परीक्षा उत्तीर्ण कर कुछ समय तक वकालत भी की।
वे स्वामी दयानन्द सरस्वती से बहुत प्रभावित थे। पंजाब में आर्य समाज के प्रचार–प्रसार में उन्होंने बढ़-चढ़कर योगदान दिया। स्वामी जी की प्रेरणा से ही लाला लाजपत राय आजादी के आंदोलन में शामिल हुए । लाला हंसराज के साथ मिलकर उन्होंने पंजाब में डीएवी (दयानन्द एंग्लो वैदिक) विद्यालय शुरू किए। पंजाब में हिन्दी को लोकप्रिय बनाने के लिए उन्होंने शिवाजी और श्रीकृष्ण की जीवनी हिन्दी में लिखी। हिन्दी को अपनाने के लिए उन्होंने देशभर में हस्ताक्षर अभियान भी चलाया। उनकी बहादुरी के कारण लोग उन्हें सम्मान से ‘पंजाब केसरी’ कहा करते थे। ‘पंजाब नेशनल बैंक’ की स्थापना उन्होंने ही की थी।
मात्र 23 साल की आयु में वे पहली बार 1888 में कांग्रेस के 'प्रयाग सम्मेलन' में शामिल हुए । वे कांग्रेस के गरम दल से जुड़े थे। बाल गंगाधर तिलक और विपिन चन्द्र पाल के साथ इनका नाम जोड़कर इन्हें ‘लाल–बाल–पाल’ कहा जाता था।
सन् 1906 में लाला लाजपत राय अपने साथी गोपालकृष्ण गोखले के साथ कांग्रेस के एक शिष्टमण्डल के सदस्य के रूप में इंग्लैड गये। यहीं से वे अमरीका के लिए भी रवाना हुए। उन्होंने वहाँ रहकर पश्चिमी देशों के समक्ष भारत की राजनैतिक परिस्थिति की वास्तविकता से लोगों को परिचित कराया तथा उन्हें स्वाधीनता आन्दोलन की जानकारी दी।
30 अक्टूबर, 1928 में वे साइमन कमीशन के विरोध में एक विशाल प्रदर्शन कर रहे थे, उस दौरान वहाँ हुए लाठी चार्ज में वे बुरी तरह घायल हो गए और अंततः 17 नवंबर, 1928 को उनकी मृत्यु हो गई।
लाला जी की मृत्यु से पूरा देश उबलने लगा। राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों से बदला लेने की ठानी। उन्होंने ठीक एक माह बाद 17 दिसम्बर, 1928 को सा̆ण्डर्स को गोली मारकर लाला जी की मौत का बदला लिया। उसके बाद जो हुआ, इतिहास उसका गवाह है।

 लाला लाजपत राय ने कहा था– ‘‘मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत में एक-एक कील का काम करेगी।’’ लाला जी की बात सही साबित हुई। उनके बलिदान के 20 साल के अन्दर ही ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्य अस्त हो गया।

Tuesday, 28 February 2017

कुंभ पर्व

कुंभ पर्व
भारत सिर्फ एक जमीन के टुकडे़ का नाम नहीं है। यह नाम है, हमारी प्राचीन परम्पराओं का, हमारे समृद्ध इतिहास का, हमारी विविधता का और इसमें बसी एकता का।
भारत में हर राज्य की अपनी अनूठी परम्पराएं हैं, अपने त्योहार हैं लेकिन ये सभी त्योहार हमें आपस में जोड़ते हैं। इन्हीं में से एक है कुंभ। प्रायः सभी भारतीय इस नाम से परिचित हैं। किन्तु बहुत कम लोग यह जानते हैं कि यह क्यों मनाया जाता है तथा इसके पीछे क्या इतिहास है?
हमारे देश में 4 कुंभ मनाये जाते हैं। पुराणों में इसके बारे में एक कहानी मिलती है। क्षीरसागर में मन्थन के समय जब अमृतकलश निकला तो उसे पाने के लिए देवताओं और असुरों में छीना–झपटी होने लगी। इसी बीच भगवान विष्णु मोहिनी के रूप में आकर घडे़ को लेकर वहाँ से ले जाने लगे। इसी भाग–दौड़ में घडे़ में से अमृत की कुछ बूंदें छिटककर चार अलग-अलग स्थानों पर आ गिरीं।
ये स्थान हैं–
·       उज्जैन
·       हरिद्वार
·       इलाहाबाद
·       नासिक
आज इन्हीं चार स्थानों को तीर्थ मानकर कुंभ का आयोजन किया जाता है।
इतिहास की दृष्टि से देखें तो छठी सदी के आसपास चीनी यात्री ह्वेंसांग ने भारत भ्रमण करने के बाद जो यात्रा-विवरण लिखा है, उसमें भी कुंभ का वर्णन मिलता है।
संस्कृत में अन्तरिक्षविज्ञान और ज्योतिष के ग्रन्थों में कुंभ की वैज्ञानिकता का वर्णन मिलता है। विज्ञान के अनुसार बृहस्पति और सूर्य की स्थिति के आधार पर ही कुंभ का निर्धारण होता है। कुंभ का आरम्भ पूर्णिमा तिथि से होता है। दो कुंभ के बीच प्रायः 3 वर्षों का अन्तर होता है।
हरिद्वार और इलाहाबाद में मनाया जाने वाला कुंभ अर्धकुंभ कहलाता है। नासिक और उज्जैन में पूर्णकुंभ मनाया जाता है, इसे ही महाकुंभ भी कहते हैं।
ग्रह और नक्षत्रों की अवस्था का सीधा प्रभाव हमारे वायुमंडल और जल पर पड़ता है। ग्रहों की स्थिति से जल पर पड़ने वाली सूर्य की किरणें विशेष प्रभाव डालती हैं। इसीलिए कुंभ में स्नान का विशेष महत्त्व है।
स्नान–
कुंभ में स्नान की भी एक विशिष्ट परम्परा है जो प्राचीन सन्तों की बनाई हुई है। इसमें सर्वप्रथम स्नान का अधिकार साधु संन्यासियों को है। साधु संन्यासियों की परंपरा में 10 अखाडे प्रसिद्ध हैं। ऐसा माना जाता है कि आदि शंकराचार्य ने सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए इन अखाडों की स्थापना की थी।
पिछले वर्ष ही मध्यप्रदेश के उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ का आयोजन किया गया। इसमें पवित्र शिप्रा नदी में स्नान करने की परंपरा है।

इतनी महत्त्वपूर्ण खगोलीय स्थिति को लेकर भारत के अलावा अन्य किसी देश में शायद ही इस तरह का कोई पर्व मनाया जाता हो। 

कालिदास

कालिदास
कालिदास विश्वसाहित्य की अनमोल धरोहर हैं। वाल्मीकि और वेदव्यास के बाद जिन रचनाकारों ने भारतीय साहित्य और मानवीय चेतना पर अमिट छाप छोड़ी है, उनमें कालिदास सबसे आगे हैं।
कालिदास को लेकर कई किंवदन्तियां (कहानियां) प्रचलित हैं। कोई कहता है कि वे कश्मीर के थे तो कोई उन्हें उज्जैन का बताता है। कोई कहता है कि कालिदास उज्जयिनी के राजा विक्रम के समय में थे तो कोई उन्हें गुप्त काल का मानता है।
कालिदास संस्कृत साहित्य के एक जाने माने नाम हैं, जिन्हें न केवल भारत में बल्कि विदेश में भी उनकी लेखन कला के कारण जाना जाता है। इसीलिए कालिदास महाकवि कहे जाते हैं। पंडित श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कालिदास को राष्ट्रीय कवि की उपाधि से विभूषित किया है। कालिदास ने अपनी कृतियों में कहीं भी अपना परिचय नहीं दिया है। उन्होंने अपने या अपने निवास स्थान या परिवार के बारे में भी कोई जानकारी नहीं दी है।
एक मान्यता के अनुसार महाकवि कालिदास उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य की सभा में मौजूद नवरत्नों में से एक हैं। एक रोचक किंवदन्ती यह भी है कि वे पहले अनपढ़ और मूर्ख थे।
ऐसा कहा जाता है कि राजकुमारी विद्योत्तमा ने प्रतिज्ञा की थी कि जो कोई उसे शास्त्रार्थ में पराजित करेगा, वह उसी के साथ शादी करेगी। विद्योत्तमा ने जब शास्त्रार्थ में आए विद्वानों को हरा दिया तो अपमान से दुखी विद्वानों ने कालिदास से उसका शास्त्रार्थ कराया। विद्योत्तमा ने मौन शब्दावली में गूढ़ प्रश्न पूछे, जिनके कालिदास ने अपनी बुद्धि से मौन संकेतों से ही जवाब दे दिये। विद्योत्तमा को लगा कि कालिदास गूढ़ प्रश्न का गूढ़ जवाब दे रहे हैं। उदाहरण के लिए विद्योत्तमा ने प्रश्न के रूप में खुला हाथ दिखाया तो कालिदास को लगा कि यह थप्पड़ मारने की धमकी दे रही है। उसके जवाब में कालिदास ने घूंसा दिखाया तो विद्योत्तमा को लगा कि वह कह रहा है कि पाँचों इन्द्रियां भले ही अलग हों, सभी एक मन के द्वारा संचालित हैं। इस तरह विद्योतमा ने पराजय स्वीकार की और दोनों का विवाह हो गया। बाद में विद्योत्तमा को सच्चाई का पता चला कि कालिदास अनपढ़ हैं। उसने कालिदास को धिक्कारा और यह कहकर घर से निकाल दिया कि पंडित बने बिना घर वापिस मत आना। कालिदास ने सच्चे मन से देवी काली की आराधना की और उनके आशीर्वाद और अभ्यास से वे ज्ञानी बन गए। ज्ञान प्राप्ति के बाद जब वे घर लौटे तो उन्होंने दरवाजा खड़का कर कहा – 'अनावृतकपाटं द्वारं देहि' अर्थात् दरवाजा खोलो, जवाब में अन्दर से विद्योत्तमा की आवाज आई–'अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः' अर्थात्  ‘‘क्या आपने कोई विशेष योग्यता प्राप्त कर ली है?’’  इतना सुनते ही कालिदास वहाँ से लौट गए। उन्होंने विद्योत्तमा के उस प्रश्न के एक–एक शब्द से एक–एक ग्रन्थ की रचना की।
कालिदास के समय के बारे में ठीक–ठीक कुछ नहीं कहा जा सकता। अधिकांश विद्वान मानते हैं कि उनका समय ईसवी के आरंभ से लेकर छठी सदी के बीच है। कालिदास ने शुंग वंशी शासक अग्निमित्र को नायक बनाकर ‘मालविकाग्निमित्र’ नाटक लिखा है। इससे इतना तो साफ है कि उनका समय अग्निमित्र के समय (150 ईसा पूर्व) के बाद का ही होगा। छठी सदी के प्रसिद्ध लेखक बाणभट्ट ने अपनी कृति ‘हर्षचरित’ में कालिदास की काव्यशैली का जिक्र किया है। अतः यह भी निश्चित है कि कालिदास छठी सदी के बाद के नहीं हैं। छठी सदी के ‘ऐहोल शिलालेख’ में भी कालिदास का वर्णन मिलता है। इससे यह स्पष्ट है कि कालिदास ईसवी की शुरुआत से लेकर छठी सदी के बीच ही किसी समय में हुए हैं।
कालिदास ने संस्कृत में 7 किताबें लिखी हैं, जिनमें 3 नाटक, 2 महाकाव्य और 2 खण्डकाव्य हैं।  ये सभी ग्रन्थ विविध पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं।
कालिदास अपनी सरल एवं सहज वर्णनशैली के लिए जाने जाते हैं। प्रकृति वर्णन में कालिदास का कोई सानी नहीं है। शृंगार रस से सराबोर उनकी कृतियों में प्रेम का अलौकिक स्वरूप दृग्गोचर होता है।
अभिज्ञानशाकुन्तल – दुष्यन्त और शकुन्तला की प्रेमकथा। यह रचना कालिदास की जगतप्रसिद्धि का कारण बनी। इस नाटक का अनुवाद अंग्रेजी और जर्मन के अलावा दुनिया की अनेक भाषाओं में हुआ है। इसमें राजा दुष्यंत की कहानी है वह जंगल में एक ऋषि पुत्री शकुन्तला (विश्वामित्र और मेनका की बेटी) से प्रेम करने लगता है। दोनों जंगल में गांधर्व विवाह कर लेते हैं। तदुपरांत राजा दुष्यंत अपनी राजधानी लौट आते हैं। इसी बीच ऋषि दुर्वासा शकुंतला को शाप दे देते हैं कि जिसके वियोग में उसने दुर्वासा का अपमान किया वही उसे भूल जाएगा। काफी क्षमाप्रार्थना के बाद दुर्वासा ने शाप को थोड़ा नरम करते हुए कहा कि राजा को अंगूठी दिखाते ही उन्हें सब कुछ याद आ जाएगा। दुष्यन्त की राजधानी में जाते हुए रास्ते में वह अंगूठी किसी तालाब में खो गई किन्तु फिर भी शकुंतला दुष्यन्त के पास गई लेकिन हुआ वही कि राजा ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया। वह अंगूठी किसी मछुआरे को मिली। राजकीय संपत्ति होने के कारण उसे राजा के सामने लाया गया तो राजा को सब कुछ याद आ गया और राजा ने शकुंतला को अपना लिया।
मेघदूत –  कालिदास अनुपम कल्पना के धनी थे। उन्होंने इस कृति में यक्ष और यक्षिणी की विरह वेदना को शब्द दिए हैं। कुबेर के शाप के कारण नायक यक्ष एक वर्ष तक अपनी प्रिया से दूर रहने को विवश है। ऐसे में कवि ने क्या खूब कल्पना की है कि यक्ष एक बादल से कहता है कि ‘‘जाओ और मेरी प्रिया को मेरा संदेश दे दो। मैं जल्द ही उससे मिलूंगा।’’ इस वेदना में यक्ष चेतन और अचेतन का अन्तर ही भूल बैठा है। यक्ष बादल को रामगिरि से लेकर हिमालय के गोद में मौजूद अलकापुरी तक का रास्ता बताता है। इस दौरान कवि की कल्पना शक्ति एवं भारतीय भूगोल–ज्ञान का अनुपम संगम देखने को मिलता है।
ऋतुसंहार –  प्रेम का कैलेण्डर। इस कृति में कालिदास ने समस्त ऋतुओं का मनोरम एवं शृंगारिक वर्णन किया है।
कालिदास के साहित्य को आधार बनाकर बहुत सी फिल्म और नाटक बनाये गए हैं। इनमें शाकुंतल पर आधारित ‘वी शान्ताराम’ द्वारा निर्देशित ‘स्त्री’ फिल्म प्रमुख है। हिन्दी लेखक मोहन राकेश ने कालिदास के जीवन पर प्रसिद्ध नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ की रचना की, जो कालिदास के संघर्षशील जीवन के भिन्न पहलुओं को दिखाता है।
कालिदास की कृतियों में अभिज्ञान शाकुन्तल सर्वाधिक प्रसिद्ध है। जर्मन कवि गेटे ने कहा है कि ‘‘यदि स्वर्ग लोग और मनुष्यलोक को एक ही जगह पर देखना हो तो मेरे मुह से सहसा एक ही नाम निकलता है, वह है शाकुन्तल।’’
कालिदास की इन्हीं खूबियों के कारण उन्हें भारत का शेक्सपियर कहा जाता है।  

मकर संक्रान्ति

मकर संक्रान्ति
       मकर संक्रान्ति हमारे देश का प्रसिद्ध त्योहार है। दक्षिण भारत में इसी पर्व को पोंगल के नाम से मनाया जाता है। देश के अन्य भागों में इसे ताई पोंगल, उझवर तिरुनल, माघी, भोगाली बिहु, शिशुर सेक्रांत, खिचड़ी जैसे अलग–अलग नामों से जाना जाता है।
इस त्योहार का संबध सूर्य की गति के साथ है। पौष माह में जब सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में संक्रान्ति अर्थात् प्रवेश करता है। तब मकर संक्रांति पर्व मनाया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायन में आता है अर्थात् सूर्य की गति उत्तरायन हो जाती है। इसीलिए इस पर्व को उत्तरायणी भी कहा जाता है।
वास्तव में यह कृषि से जुड़ा हुआ पर्व है। फसल कटाई का मौसम होने के कारण किसानों के लिए यह खास महत्त्व रखता है। इसे किसानों की संपन्नता के प्रतीक के रूप में भी मनाया जाता है।
हरियाणा और पंजाब में इसे लोहड़ी के नाम से मनाया जाता है। इस त्योहार में आग जलाकर अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल, गुड़, चावल और भुनी हुई मक्का की आहुति दी जाती है। इस अवसर पर लोग तिल, मूंगफली और गुड़ की बनी हुई गजक और रेवड़ियां बांटकर खुशियां मनाते हैं।
उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद के प्रयाग में इस अवसर पर माघ मेला लगता है, जो 1 माह तक चलता है। शिवरात्रि के स्नान के साथ इस मेले की समाप्ति होती है। स्नान के बाद खिचड़ी खाने और खिचड़ी ही दान करने की परंपरा है, इसीलिए इसे खिचड़ी पर्व भी कहते है। इसी तरह बिहार, महाराष्ट्र और बंगाल में भी इस पर्व पर नदी में स्नान करके विभिन्न वस्तुएं दान करने की परंपरा है।
तमिलनाडू में यह पर्व पोंगल के नाम से मनाते हैं। यहां इसे 4 दिन तक मनाया जाता है। प्रथम दिन भोगी-पोंगल, द्वितीय दिन सूर्य-पोंगल, तृतीय दिन मट्टू-पोंगल अथवा केनू-पोंगल और चौथे व अन्तिम दिन कन्या-पोंगल। इस प्रकार पहले दिन कूड़ा करकट इकठ्ठा करके जलाया जाता है, दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है। पोंगल मनाने के लिये स्नान करके खुले आँगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनायी जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं। इसके बाद सूर्य देव को नैवैद्य चढ़ाया जाता है। उसके बाद खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
राजस्थान में इस पर्व पर सुहागन महिलाएँ अपनी सास को बायना देकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। साथ ही महिलाएँ किसी भी सौभाग्यसूचक वस्तु का चौदह की संख्या में पूजन एवं संकल्प कर चौदह ब्राह्मणों को दान देती हैं। इस प्रकार मकर संक्रान्ति के माध्यम से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की झलक विविध रूपों में दिखाई देती है।


Monday, 20 February 2017



मृदा–संरक्षणम्

मृदा–संरक्षणम्
प्रारम्भे एवमनुमन्यते स्म यत् रासायनिक–उर्वरकाणां प्रयोगेण एव समुचिता कृषिः भवति, किन्तु वैज्ञनिकाः वदन्ति यत् रासायनिक–उर्वरकाणां अधिकप्रयोगेण मृदायाः हानिः संभवति, उक्तं हि– अति सर्वत्र वर्जयेत्।
भूमेः स्वास्थ्यं प्रति जनान् जागरूकान् करोति इफकोसंस्था। एतदर्थम् इफको एकम् अभियानं चालयति ‘Save the Soil’ इति अर्थात् मृदा–संरक्षणम् इति। अस्य आरम्भः 2009 तमे वर्षे अभवत्। एतद्द्वारा इफको ग्रामं–ग्रामं गत्वा तत्र मृदायाः परीक्षणं करोति। परिणामानुसारम् एव कृषकं उर्वरकस्य प्रयोगाय निर्देशं करोति। अनेकवर्षाणां प्रयासेन इफको स्वकार्ये सफला अभवत्। इदानीं भारते कृषकवर्गः मृदा–स्वास्थ्य–परीक्षणं कारयित्वा एव उर्वरकप्रयोगं करोति। अनेन धान्यवृद्धिः अपि संपन्ना।

। जयतु कृषकः।

OK की कहानी

OK की कहानी
हम दिन भर में न जाने कितनी बार OK शब्द सुनते और बोलते हैं। आज हम लोग जानेंगे कि ओके शब्द कहाँ से आया और किस किस अर्थ में प्रयोग होता है। ओके शब्द की शुरुआत के बारे में बहुत सारी कहानियां मिलती है और वे सभी बहुत रोचक हैं। अमेरिकी विद्वान् एलेन वा̆कर रीड ने इस शब्द के प्रचलन पर बहुत खोज की है। उनका मानना है कि यूरोप में गलत स्पेलिंगों के चलन के कारण ही ओके शब्द बना। यह Oll Korrect शब्द का ही छोटा रूप है।  यूरोप के इतिहास में बडे बडे लोग भी स्पेलिग गलत लिखने लगे थे। ये सब एक फैशन की तरह चल पडा था। इसी दौरान all correct के लिए Oll Kerrect स्पेलिंग लिखी जाने लगी, और उसका संक्षिप्त रूप भी OK के रूप में प्रयोग होने लगा ।
दुनिया में पहली बार Ok शब्द का प्रयोग All Correct के अर्थ में 23 मार्च, 1839 को बोस्टन मार्निंग पोस्ट के दूसरे पेज पर किया गया। उस समय और भी बहुत सारे इस तरह के शब्द बनने लगे लेकिन यह शब्द ज्यादा प्रचलन में इसीलिए आया क्योंकि अमेरिका की राजनीति में इस शब्द का खूब इस्तेमाल हुआ। 1840 में अमरीकन डेमोक्रटिक पार्टी ने अपने उम्मीदवार मार्टिन वैन बुरेन के लिए उनके निवासस्थान के आधार पर ‘Old Kinderhook’ नाम से एक उपनाम देकर प्रसिद्ध कर दिया। फिर संक्षिप्तीकरण की प्रक्रिया में ‘Vote for OK’ के नारे लगाये गये। पूरे अमरीका में ये नारा प्रसिद्ध हुआ। लोगों ने इसका अर्थ ‘Vote for Oll Korrect’ भी कर दिया। उनके प्रचार के लिए OK Club भी शुरु किया गया। OK की गलत वर्तनी वाली धारणा का फायदा उठाकर विपक्षी दल ने पूरे देश में प्रचार किया कि डेमोक्रेटिक पार्टी को शब्दों की सही स्पेलिंग भी नहीं आती, वो देश क्या चलाएंगे। इन पाटिर्यो  की आपसी लडाई ने ओके को पूरे देश में फैला दिया। 1840 के बाद के दशकों में इसका प्रयोग प्रायः उन दस्तावेजों के लिए होने लगा, जो जांचे जा चुके होते थे। उसके बाद धीरे धीरे टेलिग्राफ में इसका प्रयोग बढने लगा। साहित्यिक लेखन में इस शब्द का प्रयोग सीमित था लेकिन 20वी सदी के आते–आते यह शब्द मुख्यधारा में आ गया।
हम इसे OK, O.K. या Okay  लिखते हैं। इसके अलावा भी पूरी दुनिया में इसे लिखने के और भी दर्जनों तरीके हैं।

इसका प्रयोग कभी अनुमोदन या स्वीकृति के लिए किया जाता है, तो कभी सन्देह, प्रश्न या पुष्टि के लिए। आज कल तो फल व सब्जियों पर भी ‘O.K, Tested’   की मोहर भी देखने को मिलती है।

योग दिवस

हम भारतीयों के लिए योग कोई नया विषय नहीं है, बल्‍कि योग तो हमेशा से हमारे ऋषि मुनियों के जीवन का एक अंग रहा है। वास्‍तव में पूरे विश्‍व को भारत ने योग के रूप में वरदान दिया है। योग की महिमा को दखते हुए संयुक्‍त राष्‍ट्र ने 21 जून को ‘अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस’ घोषित किया। पिछले वर्ष (2015) में इसी तिथि को पूरे विश्‍व ने प्रथम अन्‍तरराष्‍ट्रीय योग दिवस के रुप में मनाया। इस वर्ष भी 21 जून के दिन भारत सहित पूरे विश्‍व में बड़े उत्‍साह से योग दिवस मनाया गया।
योग दिवस 21 जून की तिथि को ही मनाने के पीछे वैज्ञानिक और पारंपरिक दोनो ही कारण हैं। खगोलशास्‍त्री ऐसा बताते हैं कि सूरज दो तरह से गति करता है- उत्तरायण और दक्षिणायन। जून महीने की 21 तारीख को ही सूरज अपनी गति बदलता है, यानि उत्तरायण से दक्षिणायन में परिवर्तित होता है। यह एक प्राकृतिक परिवर्तन है। जब सूरज दक्षिणायन में आता है तो सूरज की गर्मी और प्रकाश में भी कमी आ जाती है। इससे पृथ्वी के एक भाग पर अनेक प्रकार के रोगाणु सक्रिय हो जाते हैं और रोग फैलने की संभावना प्रबल हो जाती है। इस पर शुरुआत से ही विशेष ध्‍यान देना जरूरी है। स्‍वास्‍थ्‍य पर योग का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए अपने शरीर और मन को स्वस्‍थ रखने के लिए योगाभ्‍यास बहुत जरुरी है। इसलिए इस मौसम परिवर्तन के पहले दिन को ही योग दिवस के रूप में चुना गया।
योग हमारी हर गतिविधि से किसी न किसी प्रकार से जुड़ा हुआ है। वास्‍तव में योग जीवन को बेहतरीन ढंग से जीने की एक कला है। यह एक ऐसी जीवनशैली है जो हमारे शरीर के साथ-साथ हमारे मन को भी संतुलित रखती है। गीता में श्रीकृष्‍ण कहते हैं “ समत्‍वं योग उच्यते (द्वितीय अध्‍याय)। अर्थात समता में जीओ, यही योग है। जीवन में सफलता हो या विफलता, दोनों में तटस्थ रहना या समभाव रखना ही समत्‍व है।
छोटी बांतो को लेकर गुस्सा होना, अहंकार होना, ऊंच–नीच की भावना, प्रशंसा या पद की इच्छा के लिए लालायित रहना ये सब चीजें योग में बाधाएं हैं। इस सब परिस्थितियों में जो समान रहता है वही सच्चा योगी है।
आज कुछ लोगों ने महज कुछ आसनों और प्राणायामों में ही योग को सीमित कर दिया है। लेकिन सच तो यह है कि योग की परिधि अत्‍यंत विस्‍तृत है। आसन और प्राणायाम तो मात्र एक विशाल भवन के कोने में खड़े दो खम्‍बों की तरह है जो इसे सहारा तो दे रहे हैं लेकिन सिर्फ उन दो खम्‍बों पर ही भवन नहीं खडा है अपितु इसमें और भी स्‍तम्‍भ हैं जिन्‍होने भवन को संभाल रखा है। कहने का भाव यह है कि योग सिर्फ आसन और प्राणायाम ही नहीं होता बल्‍कि “यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्‍याहार, धारणा, ध्‍यान और समाधि” इन अंगों से योग पूर्ण होता है। इन आठ अंगों का संक्षिप्‍त विवरण इस प्रकार है-
1.      यम- अहिंसा, झूठ न बोलना, लालच न करना, अपशब्‍द न बोलना, विषयों से आसक्‍त न होना ये पांच यम हैं।
2.      नियम- स्वच्‍छता, सन्‍तुष्‍टि, तपस्‍या, अध्‍ययन, भगवान को आत्‍मसमर्पण ये पांच नियम हैं।
3.      आसन- ‘स्‍थिरं सुखं आसनम्’ अर्थात स्‍थिर और सुखपूर्वक बैठने की क्रिया ही आसन है।
4.      प्राणायाम- अपनी सांसों को नियमित करने की क्रिया ही प्राणायाम है।
5.      प्रत्‍याहार- बाहर की चीजों से मन को हटाना।
6.      धारणा- एक ही लक्ष्‍य पर ध्‍यान लगाना।
7.      ध्‍यान- ध्‍यान जिस पर केन्‍द्रित है, उसका चिंतन।
8.      समाधि- ध्‍यान को चैतन्‍य में विलय करना।
किसी ने सच ही कहा है– दवाइयां केवल आए हुए रोगों को खत्‍म करती हैं, किन्‍तु योग आरोग्‍य प्रदान करता है जिससे रोग फैलाने वाले कीटाणु पास ही नहीं आते। इसीलिए योग सबसे बडी ओषधि है।