भारत
के उत्तरपूर्वी राज्यों में झूम खेती की प्राचीन परम्परा है। इन प्रदेशों के लोग
सदियों से पहाड़ों पर सीढ़ीनुमा खेतों में इस तरह की खेती करते हैं। झूम खेती कई
मायनों में अन्य कृषि पद्धतियों से अलग है। इसमें किसान किसी एक ऐसे जमीन के टुकड़े
को चुनता है, जहाँ पिछले 4-5 सालों से खेती न हुई हो। उस दौरान उगे
हुए पौधों और खरपतवार को वहीं उसी खेत में जला दिया जाता है। किसानों का यह
विश्वास है कि उन पौधों की बची हुई राख उस जमीन में उर्वरक का कार्य करती है। यहाँ
के किसान उन खेतों को जोतते नहीं है, बल्कि बहुत हल्का हल्का
खोदकर बीज छिड़क देते हैं। किसान उस जगह 2
से 4 बार सब्जी और धान जैसी फसलें उगाते हैं। उसके बाद जब धीरे–धीरे उस जगह की उर्वरा शक्ति कम होने लगती है तो किसान उस जमीन को छोड़कर
दूसरी जगह फिर से वही प्रक्रिया दोहराते हैं। फिर 4-5 साल के लिए उस जमीन को ऐसे
ही छोड़ दिया जाता है।
इस
तरह झूम खेती में किसानों को फसल के लिए जगह बदलते रहना पड़ता है। इन खेतों में
सिचाई को लेकर भी बहुत सावधानी बरती जाती है। वही फसलें उगाई जाती हैं जिनमें बार–बार
पानी की जरूरत न हो। सीढ़ीनुमा खेतों की हर सीढ़ी को समतल बनाया जाता है, ताकि सभी खेतों में उनकी जरूरत का पानी रुक सके।
पहाड़ी
क्षेत्रों में लोकप्रिय होने के बावजूद आजकल पर्यावरणविद झूम खेती पर सवाल उठाने
लगे हैं। इस खेती से पर्यावरण को काफी
नुकसान होता है। एक ओर भूमि के जलने से उसकी उर्वरा शक्ति क्षीण होती है, वहीं
दूसरी ओर बार–बार इसके लिए खरपतवार जलाने से वातावरण में
प्रदूषण फैलता है। ऐसा देखा गया है कि कुछ राज्यों में इसके लिए जंगल भी जलाए जाते
हैं। अतः सरकार द्वारा इस खेती पर बैन भी लगाया गया है।
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