Wednesday, 28 June 2017

अंशु जमसेंपा


यूं तो हर कोई कहता है कि महिलाएं पुरुषों के बराबर होती हैं, लेकिन इस देश में ऐसी महिलाएं भी हैं, जिन्होंने यह साबित किया है कि महिलाएं पुरुषों के बराबर नहीं, बल्कि उनसे बढ़कर हैं। ऐसी ही एक महिला हैं– अरुणाचल प्रदेश की अंशु जमसेंपा। पर्वतारोही अंशु ने अपनी काबिलियत के दम पर पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन किया है।
हाल ही में अंशु ने महज 118 घंटे में 2 बार दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा फहराकर कीर्तिमान स्थापित किया है। ऐसा करने वाली वे दुनिया की पहली महिला बन गई हैं। अंशु ने अपने जीवन में हमेशा एक लक्ष्य पाने के बाद बिना रूके दूसरे लक्ष्य की तरफ कदम बढ़ाया है। उनके हौसले इनकी उम्र से बहुत बड़े हैं। अंशु पहले भी वर्ष 2011 में 10 दिन के अन्दर 2 बार एवरेस्ट फतेह करने का करिश्मा कर चुकी हैं । वर्ष 2013 में उन्होंने नेपाल के दुर्गम पहाडों की ओर से चढ़कर एवरेस्ट पर कदम रखा। पिछले वर्ष मई महीने में उन्होंने हिमालय की तीन दुर्गम चोटियों को केवल 6 दिन में फतह करने का रिकॉर्ड अपने नाम किया । ये चोटियां थीं- लोबचे (6119 मीटर), पोकल्दे (5896 मीटर) और आइलैंड (6189 मीटर)। नेपाल सरकार ने उनकी इस उपलब्धि के लिए उन्हें सम्मानित किया है।
पांचवीं बार चढ़ाई शुरू करने से पहले अंशु के शब्द थे– ‘मेरा लक्ष्य अब माउंट एवरेस्ट पर फिर तिरंगा फहराने और भगवान बुद्ध को नमन करने का है।’ इस तरह अंशु ने 5 बार 8,850 मीटर ऊंचे एवरेस्ट को फतेह करने का गौरव हासिल कर लिया है।

अंशु देश की महिलाओं के लिए एक जीता जागता आदर्श हैं। उनकी विजय इसलिए भी खास है कि उन्होंने अपने परिवार की सभी जिम्मेदारियों को निभाते हुए ये मुकाम हासिल किया है। आमतौर पर शादी के बाद जहाँ महिलाएं अपनी आशाएं और सपने भुला देती हैं वहीं अंशु ने दो बच्चों की माँ होने के बावजूद इस कठिन लक्ष्य को प्राप्त किया और पूरे देश का नाम रोशन किया ।  

झूम खेती


भारत के उत्तरपूर्वी राज्यों में झूम खेती की प्राचीन परम्परा है। इन प्रदेशों के लोग सदियों से पहाड़ों पर सीढ़ीनुमा खेतों में इस तरह की खेती करते हैं। झूम खेती कई मायनों में अन्य कृषि पद्धतियों से अलग है। इसमें किसान किसी एक ऐसे जमीन के टुकड़े को चुनता है, जहाँ पिछले 4-5 सालों से खेती न हुई हो। उस दौरान उगे हुए पौधों और खरपतवार को वहीं उसी खेत में जला दिया जाता है। किसानों का यह विश्वास है कि उन पौधों की बची हुई राख उस जमीन में उर्वरक का कार्य करती है। यहाँ के किसान उन खेतों को जोतते नहीं है, बल्कि बहुत हल्का हल्का खोदकर बीज छिड़क देते हैं।  किसान उस जगह 2 से 4 बार सब्जी और धान जैसी फसलें उगाते हैं। उसके बाद जब धीरे–धीरे उस जगह की उर्वरा शक्ति कम होने लगती है तो किसान उस जमीन को छोड़कर दूसरी जगह फिर से वही प्रक्रिया दोहराते हैं। फिर 4-5 साल के लिए उस जमीन को ऐसे ही छोड़ दिया जाता है।

इस तरह झूम खेती में किसानों को फसल के लिए जगह बदलते रहना पड़ता है। इन खेतों में सिचाई को लेकर भी बहुत सावधानी बरती जाती है। वही फसलें उगाई जाती हैं जिनमें बार–बार पानी की जरूरत न हो। सीढ़ीनुमा खेतों की हर सीढ़ी को समतल बनाया जाता है, ताकि सभी खेतों में उनकी जरूरत का पानी रुक सके।

पहाड़ी क्षेत्रों में लोकप्रिय होने के बावजूद आजकल पर्यावरणविद झूम खेती पर सवाल उठाने लगे हैं।  इस खेती से पर्यावरण को काफी नुकसान होता है। एक ओर भूमि के जलने से उसकी उर्वरा शक्ति क्षीण होती है, वहीं दूसरी ओर बार–बार इसके लिए खरपतवार जलाने से वातावरण में प्रदूषण फैलता है। ऐसा देखा गया है कि कुछ राज्यों में इसके लिए जंगल भी जलाए जाते हैं। अतः सरकार द्वारा इस खेती पर बैन भी लगाया गया है। 

स्वामी दयानन्द सरस्वती


स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्म 12 फरवरी, 1824 को गुजरात के टंकारा जिले में हुआ। इनका नाम बचपन में मूलशंकर था । इनके पिता कर्षण जी पेशे से कलेक्टर थे और माँ यशोदा बाई गृहिणी थी । मूलशंकर ने 12 वर्ष की आयु तक घर में रहकर ही पिता से शिक्षा प्राप्त की।
स्वामी जी के जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिनके कारण उन्होंने सामाजिक मान्यताओं पर प्रश्न करना शुरू कर दिया। अपनी छोटी बहन और सबसे ज्यादा प्यार करने वाले अपने चाचा की हैजे के कारण मृत्यु देखने के बाद वे बचपन में ही अंदर तक टूट गए और जीवन के इस भयावह सत्य को जानने के लिए व्याकुल हो उठे। उनके प्रश्न और कठिन हो चले थे, जिनका उत्तर उनके माता–पिता भी न दे पाते थे। अन्त में पिता ने आस्था का मार्ग खोजा और मूलशंकर को शिवशंकर का महत्त्व समझाया और शिवरात्रि पर व्रत करने को कहा। मूलशंकर ने सोचा कि शिवरात्रि पर शिव को प्रसन्न करके उन्हीं से प्रश्नों का उत्तर मांगूंगा। उन्होंने शिवरात्रि में पिता के साथ सारी तैयारियां करवायी और व्रत भी रखा। जैसे–जैसे रात नजदीक आई, बालक की उत्सुकता और बढ़ती गई। रात को मन्दिर में भजन–कीर्तन होने लगे। लगभग एक पहर बीत जाने के बाद सब धीरे–धीरे सोने लगे, पर मूलशंकर की उत्सुकता कम नहीं हुई। वो जाप करते हुए शिव के प्रकट होने की प्रतीक्षा कर रहे थे, कि तभी उन्होंने देखा कि मन्दिर के एक कोने से कुछ चूहे निकलकर आए और मन्दिर में उत्पात मचाने लगे। शिवलिंग पर चढ़कर मलमूत्र किया और लगाया हुआ भोग भी सारा खराब कर दिया। यह देख मूलशंकर से रहा न गया। उन्होंने झट से पिता को उठाकर पूछा कि ‘पिता जी, क्या सच में यही सच्चा शिव है, जो स्वयं अपनी रक्षा भी नहीं कर पा रहा।’
पिता ने बालक को डांटते हुए चुप करा दिया। लेकिन ये बात मूलशंकर के मन में बैठ गई कि वो सच्चे शिव को खोजकर रहेंगे।
कुछ समय बाद अवसर देखकर मूलशंकर घर से निकल भागे और मठ–मन्दिरों में घूम–घूमकर शिव की खोज करते रहे। इस दौरान एक मन्दिर में स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती ने उन्हें संन्यास की दीक्षा देकर स्वामी दयानन्द सरस्वती नाम प्रदान किया।
कई वर्षों तक ज्ञान की खोज में भटकने के बाद एक दिन वे मथुरा पहुंचे। मथुरा में स्वामी दयानन्द ने विरजानन्द दण्डी से भेंट कर अध्ययन की इच्छा प्रकट की।  विरजानन्द जी ने उन्हें शिष्य के रूप में स्वीकार कर 3 वर्ष तक शिक्षित किया। वेद, उपनिषद्, दर्शन आदि की शिक्षा पूरी करने पर जब स्वामी दयानन्द ने गुरुदक्षिणा देनी चाही तो विरजानन्द जी ने समाज हित में उनका जीवन ही मांग लिया। स्वामी दयानन्द ने सहर्ष ही गुरू का यह आदेश स्वीकार कर लिया। वे पूरे देश में घूम घूमकर वैदिक धर्म का प्रचार करने लगे और लोगों को समाज में व्याप्त कुरीतियों से सावधान करने लगे।
स्वामी दयानन्द की मान्यता थी कि वेद ईश्वरीय ज्ञान है और हम सबको वेदों के अनुसार ही जीवन जीना चाहिए। उन्होंने समाज को एक नारा दिया – ‘वेदों की ओर लौटो।’
स्वामी दयानन्द समाज में एक क्रान्ति बनकर सामने आए। उनका चिन्तन धर्म तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने भारत की आजादी के लिए भी लोगों को प्रेरित किया। स्वामी जी के प्रवचनों ने देश की आजादी में नींव का काम किया। स्वामी जी की प्रेरणा से ही लाला लाजपत राय, विनायक दामोदर सावरकर, श्यामजी कृष्ण वर्मा और रामप्रसाद बिस्मिल जैसे क्रान्तिकारियों ने देश के लिए अपनी कुर्बानी दी। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने उन्हें ‘आधुनिक भारत का निर्माता’ कहा है।
शिक्षा के क्षेत्र में स्वामी जी का योगदान अविस्मरणीय है। स्वामी जी की प्रेरणा से ही लाला हंसराज ने लाहौर में डीएवी (दयानन्द एंग्लो वैदिक) का̆लेज की स्थापना की। भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए स्वामी जी के शिष्य श्रद्धानन्द सरस्वती ने हरिद्वार में गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना की। इस प्रकार प्राचीन और आधुनिक दोनों ही शिक्षा पद्धतियों के संवर्धन में स्वामी जी का योगदान अमूल्य है।
शिक्षा और धर्म के प्रचार के लिए स्वामी जी ने सन् 1875 में मुंबई में आर्यसमाज की स्थापना की। समाज को बौद्धिक विरासत देने के लिए उन्होंने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ जैसे अमर ग्रन्थ का प्रणयन किया। इस पुस्तक में प्रश्नोत्तर शैली में 14 अध्यायों (समुल्लास) में धर्म, दर्शन, ईश्वर जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई है। इसमें 3000 से ज्यादा संदर्भ दिए गए हैं, जिसके कारण यह पुस्तक स्वयं में एक बड़े शोध ग्रन्थ से कम नहीं है।
स्वामी दयानन्द जहाँ भी जाते, लोग उनके व्याख्यान के दीवाने हो जाते थे। लेकिन प्रसिद्धि अपने साथ शत्रुओं को भी जन्म देती है। राजस्थान के जोधपुर में एक वेश्या ने उनके रसोइए के साथ मिलकर उन्हें जहर दे दिया और सन् 1883 में दीपावली के दिन स्वामी जी इस धरा को छोड़कर चले गए। उनके अन्तिम शब्द थे– ‘प्रभु, तूने अच्छी लीला की। तेरी इच्छा पूर्ण हो’।

अरुणाचल प्रदेश


अरुणाचल प्रदेश भारत का एक उत्तर–पूर्वी राज्य है। ‘अरुणाचल’ का अर्थ है, ‘उगते सूरज का पर्वत’। इसकी राजधानी ‘ईटानगर’ है। यहाँ के लोग असमिया और हिन्दी बोलते हैं। इसके दक्षिण में असम, दक्षिणपूर्व में नागालैंड, पूर्व में म्यांमार, उत्तर में तिब्बत और पश्चिम में भूटान है।
अंग्रेजी राज में, अरुणाचल प्रदेश को पूर्वोत्तर सीमांत एजेंसी (नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी–नेफा) कहा जाता था। तब यह असम राज्य का ही हिस्सा था। इसके सामरिक महत्त्व को देखते हुए सन् 1972 में इसे केन्द्र शासित राज्य का दर्जा मिला और इसका नाम आधिकारिक रूप में अरुणाचल प्रदेश कर दिया गया। 20 फरवरी, 1987 को इसे भारतीय संघ के 24 वें राज्य के रूप में मान्यता मिली। वर्ष 1988-89 के दौरान इसे विशेष राज्य का दर्जा दिया गया ।
चारों ओर से पहाड़ों से घिरा अरुणाचल पूर्वोत्तर राज्यों में सबसे बड़ा राज्य है। बीस जिलों वाले इस राज्य में कई तरह के मौसम एक साथ देखने को मिलते हैं। तिब्बत के निकटवर्ती ऊँचाई वाले क्षेत्रों में शीत, मध्य हिमालय क्षेत्रों में समशीतोष्ण तथा निचले क्षेत्रों में नम उप उष्णकटिबंधीय मौसम पाया जाता है। यहाँ औसत से ज्यादा वर्षा होती है।
प्रदेश के 80% लोगों के जीवनयापन का मुख्य आधार कृषि है। यहाँ के लोग ‘झूम’ खेती करते हैं। यह पहाड़ी लोगों की पारंपरिक कृषि पद्धति है। अरुणाचल प्रदेश में मुख्य रूप से चावल, मक्का, बाजरा, गेहूं, जौ, दलहन, गन्ना, अदरक और तिलहन की खेती होती है। टोकरी, प्लाईवुड और मोमबत्ती निर्माण आदि यहाँ के प्रमुख कुटीर उद्योग हैं।
अरुणाचल प्रदेश में अनेक दर्शनीय स्थल हैं, जिनमें ईटा दुर्ग के अवशेष, भीष्मक नगर, परशुराम कुंड और नमदाफा अभ्यारण्य प्रमुख हैं। यहाँ ‘ईटा’ नामक एक प्राचीन एवं प्रसिद्ध किला है, जिसके नाम पर राज्य की राजधानी का नाम ‘ईटानगर’ पड़ा। इस किले का निर्माण 14-15वीं शताब्दी में कराया गया था। यहाँ का प्राकृतिक वातावरण मनमोहक है। यहाँ से कुछ ही दूरी पर ‘गंगा’ नामक एक खूबसूरत झील है। झील से सटे हरे–भरे जंगल में वन्यजीवों को घूमते हुए आसानी से देखा जा सकता है।
अरुणाचल प्रदेश में बौद्ध धर्म का अधिक प्रचार है। तवांग का बौद्ध मठ अत्यन्त प्रसिद्ध है। तिब्बती शैली में बने इस मठ की छत से पूरे ईटानगर का खूबसूरत नजारा देखा जा सकता है। इस मन्दिर में पं जवाहर लाल नेहरू के नाम से एक संग्रहालय भी मौजूद है, जिसमें पर्यटक एक जगह पर पूरे अरुणाचल प्रदेश की झलक देख सकते हैं। लकड़ियों से बनी स्थानीय सुन्दर कलाकृतियों को भी इस संग्रहालय में रखा गया है।
‘पापुम पेर’ यहाँ का प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। पर्वतीय प्रदेश होने का कारण यहाँ स्थान-स्थान पर सुरम्य पर्वत शिखर, पहाड़ी नदियां और घने जंगल देखे जा सकते हैं।
परशुराम कुंड मेला ओर मालीनीयान मेला राज्य के प्रमुख मेले हैं। इस राज्य के प्रमुख त्योहारों में सी-डोनची, सोलंग, न्योकुम, बूरी-बूट, चालो-लोकु, संगकोन, मोपीन और ओरिआ शामिल हैं। 

इफको पिकनिक 2017


भारत में प्रकृति के सौंदर्य का अनुपम खजाना है। एक ओर पर्वतराज हिमालय है तो दूसरी ओर दूर–दूर तक फैला नीला समुद्र। कहीं प्राचीन गुफाएं हैं तो सुरम्य नदियां और झरने। इस तरह भारत का हर कोना पर्टयन की दृष्टि से समृद्ध है। देश विदेश के पर्यटकों के लिए भारत एक सुनहरा विकल्प है। पिकनिक के लिए हर साल की तरह इस साल भी इफको परिवार को घुमाने की योजना बनाई गई।  इस वर्ष पिकनिक के लिए देश का हृदय कहे जाने वाले राज्य मध्यप्रदेश को चुना गया। मार्च माह के तीसरे सप्ताह में इफको के कर्मचारी और उनके परिवारजन बडी संख्या में पिकनिक के लिए ट्रेन से रवाना हुए। लगभग 5 दिनों की इस पिकनिक में भोपाल, भोजपुर और पचमढी भ्रमण का आयोजन किया गया।
भोपाल में भ्रमण की शुरुआत ‘शौर्य स्मारक’ के साथ हुई, यहाँ देश के वीरों की शौर्य गाथाएं वर्णित हैं। भूमिगत प्रदर्शनी में तीनों सेनाओं के वीरों  के चित्र तथा उनकी बहादुरी का स्वर्णिम इतिहास चित्रित है। सभी ने यहाँ एक बंद कमरें में सियाचीन जैसे कृत्रिम ठंडे माहौल में सैनिकों के जीवन का आंशिक अनुभव भी लिया ।  विशाल भूखण्ड पर स्थापित उस स्मारक स्थल में एक चित्रपटल भी बनाया गया है, जहाँ आजादी की गाथाएं फिल्म रूप में दिखाई गई हैं। सबसे अद्भुत है वहाँ का प्रमुख शौर्य स्मारक। वह देखने अनूठा है। वस्तुतः वह एक कृत्रिम स्मारक है जो की घुमावदार मीनार जैसा दिखता है। पिछले वर्ष देश के माननीय प्रधानमंत्री ने इसका उदघाटन कर इसे देश को समर्पित किया था।
उसके बाद सभी ‘बडी झील’ की ओर रवाना हुए।  बड़ी झील का विस्तार लगभग छः वर्ग कि.मी. तक है। संध्या काल में भोपाल नगर का झिलमिलाता प्रतिबिम्ब झील के जल में अद्भुत और मनोरम दृश्य बनाता है।  शाम के समय ‘क्रूज में जलपान तथा संगीत के साथ झील के भ्रमण’ का आयोजन किया गया था। सभी ने उन अविस्मरणीय पलों का आनन्द लिया।
उसके बाद भोपाल से पचमढी की ओर जाते हुए रास्ते में भोजपुर आता है। भोजपुर में प्रसिद्ध है लभगभ एक हजार साल पुराना भोजेश्वर मंदिर। कहते हैं कि उस मंदिर का निर्माण तत्कालीन राजा भोज ने करवाया था इसीलिए उसे भोजेश्वर मंदिर कहते हैं। उस मंदिर में 22 फुट ऊंचा एक विशाल शिवलिंग है, जो कि आंशिक रूप से खंडित भी है। उस मंदिर की छत भी पूरी तरह बनी हुई नहीं है। देखने से लगता है कि किसी विघ्न के कारण वह मन्दिर पूरा नहीं किया जा सका होगा।
देर शाम इफको की बसें पचमढी की पहाडियों को पार करते हुए एक होटल में पहुंची , जहाँ २ दिन तक रूकने की व्यवस्था की गई थी । रात के भोजन के दौरान संगीत संध्या का आयोजन भी किया गया था। अगले दिन पचमढी में प्राचीन गुफाएं दिखाई गई और उसके बाद अप्सरा विहार का झरना जिस तक के लिए सभी को एक लंबी पदयात्रा करनी पडी।
पिकनिक का अगला पडाव था घूपगढ,  जहाँ जाने के लिए सभी लोग जीपों में बैठकर निकल पडे। पचमढी की इस सबसे ऊंची चोटी पर पहुंचने के लिए सर्पाकार रास्तों से होते हुए पूरा काफिला धूपगढ पहुंचा। पहाडी से दूर–दूर तक फैली हरियाली के नजारे का सबने लुत्फ उठाया। संध्याकाल के सुरम्य सूर्यास्त को देखने के लिए सभी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। अन्ततः सभी ने वो दिलकश नजारा कि कैसे सूर्य नीली गुलाबी रोशनी छिटकता हुआ आसमान के दूसरे छोर में समां गया।
इस पिकनिक में सभी का खूब मनोरंजन हुआ। सभी कर्मचारियों और  उनके परिजनों ने इस अनोखे आयोजन के लिए आयोजकों  को बधाईयां और धन्यवाद दिया।