Thursday, 9 March 2017

संस्कृत और संगणक

दुनियाभर के भाषा वैज्ञानिक ये मानते हैं कि संस्कृत सिर्फ एक प्राचीनतम भाषा ही नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक भाषा भी है। गणित, चिकित्सा शास्त्र, खगोलविज्ञान आदि सभी विषयों के आदि ग्रन्थ इसी भाषा में रचे गए। भाषविदों का मानना है कि भाषाविज्ञान के समग्र अध्ययन के लिए इस भाषा का ज्ञान अनिवार्य है।
संस्कृत में अन्य खूबियों के साथ एक खूबी यह भी है कि संस्कृत संगणक अर्थात् कंप्यूटर के लिए भी उपयुक्त भाषा है। नासा से इसरो तक सभी वैज्ञानिक इस तथ्य को स्वीकार करते हैं। संस्कृत में ऐसी अनेक खूबियां है, जो उसकी वैज्ञानिकता प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं। अंग्रेजी आदि भाषाओं में एक वाक्य में आए हुए शब्दों का स्थान बदल देने  से उस वाक्य का अर्थ बदल जाता है। लेकिन संस्कृत शब्दों को कहीं भी रखा जाए, कोई फर्क नहीं पडता। वाक्य का अर्थ वही रहता है। यथा– रामः ग्रामं गच्छति (राम गांव जाता है।) को ग्रामं गच्छति रामः या फिर गच्छति  ग्रामं रामः  कहने पर  भी अर्थ परिवर्तन नहीं होता।

संस्कृत के व्याकरण पर शोध करते हुए भाषाविज्ञानिक इस निष्कर्ष तक भी पहुंच चुके हैं कि हर घर में इस्तेमाल होने वाला कंप्यूटर पाणिनि की अष्टाध्यायी( संस्कृत व्याकरण) पर ही आधारित है। संगणक भाषाविदों का मानना है कि कंप्यूटर में इस्तेमाल होने वाली भाषा और इससे बनने वाले प्रोग्राम में पाणिनि की अनुवृत्ति, अधिकार, संज्ञा और परिभाषा आदि तकनीक ही प्रयुक्त होती है। सीडैक आदि संस्थाएं इस बारे में गहन शोध कर रही हैं। इस विषय में अभी भी पर्याप्त शोध की संभावनाएं हैं  ताकि संस्कृत भाषा के महत्त्व को जानकर हम अपने पूर्वजों की विरासत पर गौरव कर सकें।

Wednesday, 8 March 2017

कौवे की परेशानी

कौवे की परेशानी
एक कौआ जंगल में रहता था और अपने जीवन से संतुष्ट था। एक दिन उसने एक हंस को देखा और अपने मन में सोचा ‘यह हंस कितना सफ़ेद है और कितना सुन्दर है’। उसे लगा कि यह हंस दुनिया में सबसे सुन्दर और सुखी पक्षी है, जबकि मैं तो कितना काला हूँ। यह सोचकर वह काफी परेशान रहने लगा और उससे रहा नहीं गया, उसने अपने मनोभाव हंस को बताए ।
हंस ने कहा – ‘वास्तिकता यह है कि पहले मैं खुद को सारे पक्षिओं से सुन्दर समझता था। लेकिन जब मैने तोते को देखा तो पाया कि उसके पास दो रंग हैं और वह बहुत ही मीठा बोलता है। तब से मुझे लगा कि पक्षिओं में तोता ही सुन्दर व सुखी है।’
अब कौआ तोते के पास गया।
तोते ने कहा – ‘मै सुखी जिंदगी जी रहा था, लेकिन जब मैंने मोर को देखा तब मुझे लगा कि मुझमें तो दो रंग ही हैं परन्तु मोर तो बहुरंगी है । मुझे तो वो ही सुन्दर और सुखी लगता है ।’
फिर कौआ उड़कर प्राणी संग्रहालय गया जहाँ कई लोग मोर देखने एकत्रित हुए थे। जब सब लोग चले गए तो कौआ उसके पास जाकर बोला – ‘मित्र, तुम तो अति सुन्दर हो, कितने सारे लोग तुम्हें देखने के लिए इकट्ठे होते हैं। प्रतिदिन तुम्‍हें देखने के लिए हजारों  लोग आते है, जब कि देखते ही लोग मुझे उड़ा देते है। मुझे लगता है कि इस धरती पर तो तुम ही सभी पक्षिओ में सबसे सुन्दर और सुखी हो।’
मोर ने गहरी सांस लेते हुए कहा – ‘मैं हमेशा सोचता था कि इस पृथ्वी पर मैं ही सबसे सुन्दर हूँ, मैं ही अतिसुखी हूँ । परन्तु मेरे सौन्दर्य के कारण ही मैं यहाँ पिंजरे में बंद हूँ। मैंने सारे प्राणियों को गौर से देखा तो मैंने जाना कि ‘तुम ही ऐसे पक्षी हो, जिसे पिंजरे में बंद नहीं किया जाता।’ मुझे तो लगता है कि काश मैं भी तुम्हारी तरह कौआ होता तो स्वतंत्रता से सभी जगह घूमता-उड़ता, सुखी रहता ।”
हम अनावश्यक ही दूसरों से अपनी तुलना किया करते है और दुखी-उदास रहते है ।  हमें जो मिला है, हमें उसकी कद्र करनी चाहिए।

Wednesday, 1 March 2017

लाला लाजपतराय

लाला लाजपतराय
लाला लाजपतराय का जन्म 28 जनवरी, 1865 को पंजाब प्रान्त के मोगा जिले में हुआ। उनकी आरंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। उनके पिता लाला राधाकृष्ण से उन्हें उर्दू और फारसी की तालीम मिली। उच्चशिक्षा के लिए वे लाहौर आ गए। उन्होंने वकालत की परीक्षा उत्तीर्ण कर कुछ समय तक वकालत भी की।
वे स्वामी दयानन्द सरस्वती से बहुत प्रभावित थे। पंजाब में आर्य समाज के प्रचार–प्रसार में उन्होंने बढ़-चढ़कर योगदान दिया। स्वामी जी की प्रेरणा से ही लाला लाजपत राय आजादी के आंदोलन में शामिल हुए । लाला हंसराज के साथ मिलकर उन्होंने पंजाब में डीएवी (दयानन्द एंग्लो वैदिक) विद्यालय शुरू किए। पंजाब में हिन्दी को लोकप्रिय बनाने के लिए उन्होंने शिवाजी और श्रीकृष्ण की जीवनी हिन्दी में लिखी। हिन्दी को अपनाने के लिए उन्होंने देशभर में हस्ताक्षर अभियान भी चलाया। उनकी बहादुरी के कारण लोग उन्हें सम्मान से ‘पंजाब केसरी’ कहा करते थे। ‘पंजाब नेशनल बैंक’ की स्थापना उन्होंने ही की थी।
मात्र 23 साल की आयु में वे पहली बार 1888 में कांग्रेस के 'प्रयाग सम्मेलन' में शामिल हुए । वे कांग्रेस के गरम दल से जुड़े थे। बाल गंगाधर तिलक और विपिन चन्द्र पाल के साथ इनका नाम जोड़कर इन्हें ‘लाल–बाल–पाल’ कहा जाता था।
सन् 1906 में लाला लाजपत राय अपने साथी गोपालकृष्ण गोखले के साथ कांग्रेस के एक शिष्टमण्डल के सदस्य के रूप में इंग्लैड गये। यहीं से वे अमरीका के लिए भी रवाना हुए। उन्होंने वहाँ रहकर पश्चिमी देशों के समक्ष भारत की राजनैतिक परिस्थिति की वास्तविकता से लोगों को परिचित कराया तथा उन्हें स्वाधीनता आन्दोलन की जानकारी दी।
30 अक्टूबर, 1928 में वे साइमन कमीशन के विरोध में एक विशाल प्रदर्शन कर रहे थे, उस दौरान वहाँ हुए लाठी चार्ज में वे बुरी तरह घायल हो गए और अंततः 17 नवंबर, 1928 को उनकी मृत्यु हो गई।
लाला जी की मृत्यु से पूरा देश उबलने लगा। राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों से बदला लेने की ठानी। उन्होंने ठीक एक माह बाद 17 दिसम्बर, 1928 को सा̆ण्डर्स को गोली मारकर लाला जी की मौत का बदला लिया। उसके बाद जो हुआ, इतिहास उसका गवाह है।

 लाला लाजपत राय ने कहा था– ‘‘मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत में एक-एक कील का काम करेगी।’’ लाला जी की बात सही साबित हुई। उनके बलिदान के 20 साल के अन्दर ही ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्य अस्त हो गया।