Tuesday, 28 February 2017

कुंभ पर्व

कुंभ पर्व
भारत सिर्फ एक जमीन के टुकडे़ का नाम नहीं है। यह नाम है, हमारी प्राचीन परम्पराओं का, हमारे समृद्ध इतिहास का, हमारी विविधता का और इसमें बसी एकता का।
भारत में हर राज्य की अपनी अनूठी परम्पराएं हैं, अपने त्योहार हैं लेकिन ये सभी त्योहार हमें आपस में जोड़ते हैं। इन्हीं में से एक है कुंभ। प्रायः सभी भारतीय इस नाम से परिचित हैं। किन्तु बहुत कम लोग यह जानते हैं कि यह क्यों मनाया जाता है तथा इसके पीछे क्या इतिहास है?
हमारे देश में 4 कुंभ मनाये जाते हैं। पुराणों में इसके बारे में एक कहानी मिलती है। क्षीरसागर में मन्थन के समय जब अमृतकलश निकला तो उसे पाने के लिए देवताओं और असुरों में छीना–झपटी होने लगी। इसी बीच भगवान विष्णु मोहिनी के रूप में आकर घडे़ को लेकर वहाँ से ले जाने लगे। इसी भाग–दौड़ में घडे़ में से अमृत की कुछ बूंदें छिटककर चार अलग-अलग स्थानों पर आ गिरीं।
ये स्थान हैं–
·       उज्जैन
·       हरिद्वार
·       इलाहाबाद
·       नासिक
आज इन्हीं चार स्थानों को तीर्थ मानकर कुंभ का आयोजन किया जाता है।
इतिहास की दृष्टि से देखें तो छठी सदी के आसपास चीनी यात्री ह्वेंसांग ने भारत भ्रमण करने के बाद जो यात्रा-विवरण लिखा है, उसमें भी कुंभ का वर्णन मिलता है।
संस्कृत में अन्तरिक्षविज्ञान और ज्योतिष के ग्रन्थों में कुंभ की वैज्ञानिकता का वर्णन मिलता है। विज्ञान के अनुसार बृहस्पति और सूर्य की स्थिति के आधार पर ही कुंभ का निर्धारण होता है। कुंभ का आरम्भ पूर्णिमा तिथि से होता है। दो कुंभ के बीच प्रायः 3 वर्षों का अन्तर होता है।
हरिद्वार और इलाहाबाद में मनाया जाने वाला कुंभ अर्धकुंभ कहलाता है। नासिक और उज्जैन में पूर्णकुंभ मनाया जाता है, इसे ही महाकुंभ भी कहते हैं।
ग्रह और नक्षत्रों की अवस्था का सीधा प्रभाव हमारे वायुमंडल और जल पर पड़ता है। ग्रहों की स्थिति से जल पर पड़ने वाली सूर्य की किरणें विशेष प्रभाव डालती हैं। इसीलिए कुंभ में स्नान का विशेष महत्त्व है।
स्नान–
कुंभ में स्नान की भी एक विशिष्ट परम्परा है जो प्राचीन सन्तों की बनाई हुई है। इसमें सर्वप्रथम स्नान का अधिकार साधु संन्यासियों को है। साधु संन्यासियों की परंपरा में 10 अखाडे प्रसिद्ध हैं। ऐसा माना जाता है कि आदि शंकराचार्य ने सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए इन अखाडों की स्थापना की थी।
पिछले वर्ष ही मध्यप्रदेश के उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ का आयोजन किया गया। इसमें पवित्र शिप्रा नदी में स्नान करने की परंपरा है।

इतनी महत्त्वपूर्ण खगोलीय स्थिति को लेकर भारत के अलावा अन्य किसी देश में शायद ही इस तरह का कोई पर्व मनाया जाता हो। 

कालिदास

कालिदास
कालिदास विश्वसाहित्य की अनमोल धरोहर हैं। वाल्मीकि और वेदव्यास के बाद जिन रचनाकारों ने भारतीय साहित्य और मानवीय चेतना पर अमिट छाप छोड़ी है, उनमें कालिदास सबसे आगे हैं।
कालिदास को लेकर कई किंवदन्तियां (कहानियां) प्रचलित हैं। कोई कहता है कि वे कश्मीर के थे तो कोई उन्हें उज्जैन का बताता है। कोई कहता है कि कालिदास उज्जयिनी के राजा विक्रम के समय में थे तो कोई उन्हें गुप्त काल का मानता है।
कालिदास संस्कृत साहित्य के एक जाने माने नाम हैं, जिन्हें न केवल भारत में बल्कि विदेश में भी उनकी लेखन कला के कारण जाना जाता है। इसीलिए कालिदास महाकवि कहे जाते हैं। पंडित श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कालिदास को राष्ट्रीय कवि की उपाधि से विभूषित किया है। कालिदास ने अपनी कृतियों में कहीं भी अपना परिचय नहीं दिया है। उन्होंने अपने या अपने निवास स्थान या परिवार के बारे में भी कोई जानकारी नहीं दी है।
एक मान्यता के अनुसार महाकवि कालिदास उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य की सभा में मौजूद नवरत्नों में से एक हैं। एक रोचक किंवदन्ती यह भी है कि वे पहले अनपढ़ और मूर्ख थे।
ऐसा कहा जाता है कि राजकुमारी विद्योत्तमा ने प्रतिज्ञा की थी कि जो कोई उसे शास्त्रार्थ में पराजित करेगा, वह उसी के साथ शादी करेगी। विद्योत्तमा ने जब शास्त्रार्थ में आए विद्वानों को हरा दिया तो अपमान से दुखी विद्वानों ने कालिदास से उसका शास्त्रार्थ कराया। विद्योत्तमा ने मौन शब्दावली में गूढ़ प्रश्न पूछे, जिनके कालिदास ने अपनी बुद्धि से मौन संकेतों से ही जवाब दे दिये। विद्योत्तमा को लगा कि कालिदास गूढ़ प्रश्न का गूढ़ जवाब दे रहे हैं। उदाहरण के लिए विद्योत्तमा ने प्रश्न के रूप में खुला हाथ दिखाया तो कालिदास को लगा कि यह थप्पड़ मारने की धमकी दे रही है। उसके जवाब में कालिदास ने घूंसा दिखाया तो विद्योत्तमा को लगा कि वह कह रहा है कि पाँचों इन्द्रियां भले ही अलग हों, सभी एक मन के द्वारा संचालित हैं। इस तरह विद्योतमा ने पराजय स्वीकार की और दोनों का विवाह हो गया। बाद में विद्योत्तमा को सच्चाई का पता चला कि कालिदास अनपढ़ हैं। उसने कालिदास को धिक्कारा और यह कहकर घर से निकाल दिया कि पंडित बने बिना घर वापिस मत आना। कालिदास ने सच्चे मन से देवी काली की आराधना की और उनके आशीर्वाद और अभ्यास से वे ज्ञानी बन गए। ज्ञान प्राप्ति के बाद जब वे घर लौटे तो उन्होंने दरवाजा खड़का कर कहा – 'अनावृतकपाटं द्वारं देहि' अर्थात् दरवाजा खोलो, जवाब में अन्दर से विद्योत्तमा की आवाज आई–'अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः' अर्थात्  ‘‘क्या आपने कोई विशेष योग्यता प्राप्त कर ली है?’’  इतना सुनते ही कालिदास वहाँ से लौट गए। उन्होंने विद्योत्तमा के उस प्रश्न के एक–एक शब्द से एक–एक ग्रन्थ की रचना की।
कालिदास के समय के बारे में ठीक–ठीक कुछ नहीं कहा जा सकता। अधिकांश विद्वान मानते हैं कि उनका समय ईसवी के आरंभ से लेकर छठी सदी के बीच है। कालिदास ने शुंग वंशी शासक अग्निमित्र को नायक बनाकर ‘मालविकाग्निमित्र’ नाटक लिखा है। इससे इतना तो साफ है कि उनका समय अग्निमित्र के समय (150 ईसा पूर्व) के बाद का ही होगा। छठी सदी के प्रसिद्ध लेखक बाणभट्ट ने अपनी कृति ‘हर्षचरित’ में कालिदास की काव्यशैली का जिक्र किया है। अतः यह भी निश्चित है कि कालिदास छठी सदी के बाद के नहीं हैं। छठी सदी के ‘ऐहोल शिलालेख’ में भी कालिदास का वर्णन मिलता है। इससे यह स्पष्ट है कि कालिदास ईसवी की शुरुआत से लेकर छठी सदी के बीच ही किसी समय में हुए हैं।
कालिदास ने संस्कृत में 7 किताबें लिखी हैं, जिनमें 3 नाटक, 2 महाकाव्य और 2 खण्डकाव्य हैं।  ये सभी ग्रन्थ विविध पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं।
कालिदास अपनी सरल एवं सहज वर्णनशैली के लिए जाने जाते हैं। प्रकृति वर्णन में कालिदास का कोई सानी नहीं है। शृंगार रस से सराबोर उनकी कृतियों में प्रेम का अलौकिक स्वरूप दृग्गोचर होता है।
अभिज्ञानशाकुन्तल – दुष्यन्त और शकुन्तला की प्रेमकथा। यह रचना कालिदास की जगतप्रसिद्धि का कारण बनी। इस नाटक का अनुवाद अंग्रेजी और जर्मन के अलावा दुनिया की अनेक भाषाओं में हुआ है। इसमें राजा दुष्यंत की कहानी है वह जंगल में एक ऋषि पुत्री शकुन्तला (विश्वामित्र और मेनका की बेटी) से प्रेम करने लगता है। दोनों जंगल में गांधर्व विवाह कर लेते हैं। तदुपरांत राजा दुष्यंत अपनी राजधानी लौट आते हैं। इसी बीच ऋषि दुर्वासा शकुंतला को शाप दे देते हैं कि जिसके वियोग में उसने दुर्वासा का अपमान किया वही उसे भूल जाएगा। काफी क्षमाप्रार्थना के बाद दुर्वासा ने शाप को थोड़ा नरम करते हुए कहा कि राजा को अंगूठी दिखाते ही उन्हें सब कुछ याद आ जाएगा। दुष्यन्त की राजधानी में जाते हुए रास्ते में वह अंगूठी किसी तालाब में खो गई किन्तु फिर भी शकुंतला दुष्यन्त के पास गई लेकिन हुआ वही कि राजा ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया। वह अंगूठी किसी मछुआरे को मिली। राजकीय संपत्ति होने के कारण उसे राजा के सामने लाया गया तो राजा को सब कुछ याद आ गया और राजा ने शकुंतला को अपना लिया।
मेघदूत –  कालिदास अनुपम कल्पना के धनी थे। उन्होंने इस कृति में यक्ष और यक्षिणी की विरह वेदना को शब्द दिए हैं। कुबेर के शाप के कारण नायक यक्ष एक वर्ष तक अपनी प्रिया से दूर रहने को विवश है। ऐसे में कवि ने क्या खूब कल्पना की है कि यक्ष एक बादल से कहता है कि ‘‘जाओ और मेरी प्रिया को मेरा संदेश दे दो। मैं जल्द ही उससे मिलूंगा।’’ इस वेदना में यक्ष चेतन और अचेतन का अन्तर ही भूल बैठा है। यक्ष बादल को रामगिरि से लेकर हिमालय के गोद में मौजूद अलकापुरी तक का रास्ता बताता है। इस दौरान कवि की कल्पना शक्ति एवं भारतीय भूगोल–ज्ञान का अनुपम संगम देखने को मिलता है।
ऋतुसंहार –  प्रेम का कैलेण्डर। इस कृति में कालिदास ने समस्त ऋतुओं का मनोरम एवं शृंगारिक वर्णन किया है।
कालिदास के साहित्य को आधार बनाकर बहुत सी फिल्म और नाटक बनाये गए हैं। इनमें शाकुंतल पर आधारित ‘वी शान्ताराम’ द्वारा निर्देशित ‘स्त्री’ फिल्म प्रमुख है। हिन्दी लेखक मोहन राकेश ने कालिदास के जीवन पर प्रसिद्ध नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ की रचना की, जो कालिदास के संघर्षशील जीवन के भिन्न पहलुओं को दिखाता है।
कालिदास की कृतियों में अभिज्ञान शाकुन्तल सर्वाधिक प्रसिद्ध है। जर्मन कवि गेटे ने कहा है कि ‘‘यदि स्वर्ग लोग और मनुष्यलोक को एक ही जगह पर देखना हो तो मेरे मुह से सहसा एक ही नाम निकलता है, वह है शाकुन्तल।’’
कालिदास की इन्हीं खूबियों के कारण उन्हें भारत का शेक्सपियर कहा जाता है।  

मकर संक्रान्ति

मकर संक्रान्ति
       मकर संक्रान्ति हमारे देश का प्रसिद्ध त्योहार है। दक्षिण भारत में इसी पर्व को पोंगल के नाम से मनाया जाता है। देश के अन्य भागों में इसे ताई पोंगल, उझवर तिरुनल, माघी, भोगाली बिहु, शिशुर सेक्रांत, खिचड़ी जैसे अलग–अलग नामों से जाना जाता है।
इस त्योहार का संबध सूर्य की गति के साथ है। पौष माह में जब सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में संक्रान्ति अर्थात् प्रवेश करता है। तब मकर संक्रांति पर्व मनाया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायन में आता है अर्थात् सूर्य की गति उत्तरायन हो जाती है। इसीलिए इस पर्व को उत्तरायणी भी कहा जाता है।
वास्तव में यह कृषि से जुड़ा हुआ पर्व है। फसल कटाई का मौसम होने के कारण किसानों के लिए यह खास महत्त्व रखता है। इसे किसानों की संपन्नता के प्रतीक के रूप में भी मनाया जाता है।
हरियाणा और पंजाब में इसे लोहड़ी के नाम से मनाया जाता है। इस त्योहार में आग जलाकर अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल, गुड़, चावल और भुनी हुई मक्का की आहुति दी जाती है। इस अवसर पर लोग तिल, मूंगफली और गुड़ की बनी हुई गजक और रेवड़ियां बांटकर खुशियां मनाते हैं।
उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद के प्रयाग में इस अवसर पर माघ मेला लगता है, जो 1 माह तक चलता है। शिवरात्रि के स्नान के साथ इस मेले की समाप्ति होती है। स्नान के बाद खिचड़ी खाने और खिचड़ी ही दान करने की परंपरा है, इसीलिए इसे खिचड़ी पर्व भी कहते है। इसी तरह बिहार, महाराष्ट्र और बंगाल में भी इस पर्व पर नदी में स्नान करके विभिन्न वस्तुएं दान करने की परंपरा है।
तमिलनाडू में यह पर्व पोंगल के नाम से मनाते हैं। यहां इसे 4 दिन तक मनाया जाता है। प्रथम दिन भोगी-पोंगल, द्वितीय दिन सूर्य-पोंगल, तृतीय दिन मट्टू-पोंगल अथवा केनू-पोंगल और चौथे व अन्तिम दिन कन्या-पोंगल। इस प्रकार पहले दिन कूड़ा करकट इकठ्ठा करके जलाया जाता है, दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है। पोंगल मनाने के लिये स्नान करके खुले आँगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनायी जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं। इसके बाद सूर्य देव को नैवैद्य चढ़ाया जाता है। उसके बाद खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
राजस्थान में इस पर्व पर सुहागन महिलाएँ अपनी सास को बायना देकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। साथ ही महिलाएँ किसी भी सौभाग्यसूचक वस्तु का चौदह की संख्या में पूजन एवं संकल्प कर चौदह ब्राह्मणों को दान देती हैं। इस प्रकार मकर संक्रान्ति के माध्यम से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की झलक विविध रूपों में दिखाई देती है।


Monday, 20 February 2017



मृदा–संरक्षणम्

मृदा–संरक्षणम्
प्रारम्भे एवमनुमन्यते स्म यत् रासायनिक–उर्वरकाणां प्रयोगेण एव समुचिता कृषिः भवति, किन्तु वैज्ञनिकाः वदन्ति यत् रासायनिक–उर्वरकाणां अधिकप्रयोगेण मृदायाः हानिः संभवति, उक्तं हि– अति सर्वत्र वर्जयेत्।
भूमेः स्वास्थ्यं प्रति जनान् जागरूकान् करोति इफकोसंस्था। एतदर्थम् इफको एकम् अभियानं चालयति ‘Save the Soil’ इति अर्थात् मृदा–संरक्षणम् इति। अस्य आरम्भः 2009 तमे वर्षे अभवत्। एतद्द्वारा इफको ग्रामं–ग्रामं गत्वा तत्र मृदायाः परीक्षणं करोति। परिणामानुसारम् एव कृषकं उर्वरकस्य प्रयोगाय निर्देशं करोति। अनेकवर्षाणां प्रयासेन इफको स्वकार्ये सफला अभवत्। इदानीं भारते कृषकवर्गः मृदा–स्वास्थ्य–परीक्षणं कारयित्वा एव उर्वरकप्रयोगं करोति। अनेन धान्यवृद्धिः अपि संपन्ना।

। जयतु कृषकः।

OK की कहानी

OK की कहानी
हम दिन भर में न जाने कितनी बार OK शब्द सुनते और बोलते हैं। आज हम लोग जानेंगे कि ओके शब्द कहाँ से आया और किस किस अर्थ में प्रयोग होता है। ओके शब्द की शुरुआत के बारे में बहुत सारी कहानियां मिलती है और वे सभी बहुत रोचक हैं। अमेरिकी विद्वान् एलेन वा̆कर रीड ने इस शब्द के प्रचलन पर बहुत खोज की है। उनका मानना है कि यूरोप में गलत स्पेलिंगों के चलन के कारण ही ओके शब्द बना। यह Oll Korrect शब्द का ही छोटा रूप है।  यूरोप के इतिहास में बडे बडे लोग भी स्पेलिग गलत लिखने लगे थे। ये सब एक फैशन की तरह चल पडा था। इसी दौरान all correct के लिए Oll Kerrect स्पेलिंग लिखी जाने लगी, और उसका संक्षिप्त रूप भी OK के रूप में प्रयोग होने लगा ।
दुनिया में पहली बार Ok शब्द का प्रयोग All Correct के अर्थ में 23 मार्च, 1839 को बोस्टन मार्निंग पोस्ट के दूसरे पेज पर किया गया। उस समय और भी बहुत सारे इस तरह के शब्द बनने लगे लेकिन यह शब्द ज्यादा प्रचलन में इसीलिए आया क्योंकि अमेरिका की राजनीति में इस शब्द का खूब इस्तेमाल हुआ। 1840 में अमरीकन डेमोक्रटिक पार्टी ने अपने उम्मीदवार मार्टिन वैन बुरेन के लिए उनके निवासस्थान के आधार पर ‘Old Kinderhook’ नाम से एक उपनाम देकर प्रसिद्ध कर दिया। फिर संक्षिप्तीकरण की प्रक्रिया में ‘Vote for OK’ के नारे लगाये गये। पूरे अमरीका में ये नारा प्रसिद्ध हुआ। लोगों ने इसका अर्थ ‘Vote for Oll Korrect’ भी कर दिया। उनके प्रचार के लिए OK Club भी शुरु किया गया। OK की गलत वर्तनी वाली धारणा का फायदा उठाकर विपक्षी दल ने पूरे देश में प्रचार किया कि डेमोक्रेटिक पार्टी को शब्दों की सही स्पेलिंग भी नहीं आती, वो देश क्या चलाएंगे। इन पाटिर्यो  की आपसी लडाई ने ओके को पूरे देश में फैला दिया। 1840 के बाद के दशकों में इसका प्रयोग प्रायः उन दस्तावेजों के लिए होने लगा, जो जांचे जा चुके होते थे। उसके बाद धीरे धीरे टेलिग्राफ में इसका प्रयोग बढने लगा। साहित्यिक लेखन में इस शब्द का प्रयोग सीमित था लेकिन 20वी सदी के आते–आते यह शब्द मुख्यधारा में आ गया।
हम इसे OK, O.K. या Okay  लिखते हैं। इसके अलावा भी पूरी दुनिया में इसे लिखने के और भी दर्जनों तरीके हैं।

इसका प्रयोग कभी अनुमोदन या स्वीकृति के लिए किया जाता है, तो कभी सन्देह, प्रश्न या पुष्टि के लिए। आज कल तो फल व सब्जियों पर भी ‘O.K, Tested’   की मोहर भी देखने को मिलती है।

योग दिवस

हम भारतीयों के लिए योग कोई नया विषय नहीं है, बल्‍कि योग तो हमेशा से हमारे ऋषि मुनियों के जीवन का एक अंग रहा है। वास्‍तव में पूरे विश्‍व को भारत ने योग के रूप में वरदान दिया है। योग की महिमा को दखते हुए संयुक्‍त राष्‍ट्र ने 21 जून को ‘अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस’ घोषित किया। पिछले वर्ष (2015) में इसी तिथि को पूरे विश्‍व ने प्रथम अन्‍तरराष्‍ट्रीय योग दिवस के रुप में मनाया। इस वर्ष भी 21 जून के दिन भारत सहित पूरे विश्‍व में बड़े उत्‍साह से योग दिवस मनाया गया।
योग दिवस 21 जून की तिथि को ही मनाने के पीछे वैज्ञानिक और पारंपरिक दोनो ही कारण हैं। खगोलशास्‍त्री ऐसा बताते हैं कि सूरज दो तरह से गति करता है- उत्तरायण और दक्षिणायन। जून महीने की 21 तारीख को ही सूरज अपनी गति बदलता है, यानि उत्तरायण से दक्षिणायन में परिवर्तित होता है। यह एक प्राकृतिक परिवर्तन है। जब सूरज दक्षिणायन में आता है तो सूरज की गर्मी और प्रकाश में भी कमी आ जाती है। इससे पृथ्वी के एक भाग पर अनेक प्रकार के रोगाणु सक्रिय हो जाते हैं और रोग फैलने की संभावना प्रबल हो जाती है। इस पर शुरुआत से ही विशेष ध्‍यान देना जरूरी है। स्‍वास्‍थ्‍य पर योग का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए अपने शरीर और मन को स्वस्‍थ रखने के लिए योगाभ्‍यास बहुत जरुरी है। इसलिए इस मौसम परिवर्तन के पहले दिन को ही योग दिवस के रूप में चुना गया।
योग हमारी हर गतिविधि से किसी न किसी प्रकार से जुड़ा हुआ है। वास्‍तव में योग जीवन को बेहतरीन ढंग से जीने की एक कला है। यह एक ऐसी जीवनशैली है जो हमारे शरीर के साथ-साथ हमारे मन को भी संतुलित रखती है। गीता में श्रीकृष्‍ण कहते हैं “ समत्‍वं योग उच्यते (द्वितीय अध्‍याय)। अर्थात समता में जीओ, यही योग है। जीवन में सफलता हो या विफलता, दोनों में तटस्थ रहना या समभाव रखना ही समत्‍व है।
छोटी बांतो को लेकर गुस्सा होना, अहंकार होना, ऊंच–नीच की भावना, प्रशंसा या पद की इच्छा के लिए लालायित रहना ये सब चीजें योग में बाधाएं हैं। इस सब परिस्थितियों में जो समान रहता है वही सच्चा योगी है।
आज कुछ लोगों ने महज कुछ आसनों और प्राणायामों में ही योग को सीमित कर दिया है। लेकिन सच तो यह है कि योग की परिधि अत्‍यंत विस्‍तृत है। आसन और प्राणायाम तो मात्र एक विशाल भवन के कोने में खड़े दो खम्‍बों की तरह है जो इसे सहारा तो दे रहे हैं लेकिन सिर्फ उन दो खम्‍बों पर ही भवन नहीं खडा है अपितु इसमें और भी स्‍तम्‍भ हैं जिन्‍होने भवन को संभाल रखा है। कहने का भाव यह है कि योग सिर्फ आसन और प्राणायाम ही नहीं होता बल्‍कि “यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्‍याहार, धारणा, ध्‍यान और समाधि” इन अंगों से योग पूर्ण होता है। इन आठ अंगों का संक्षिप्‍त विवरण इस प्रकार है-
1.      यम- अहिंसा, झूठ न बोलना, लालच न करना, अपशब्‍द न बोलना, विषयों से आसक्‍त न होना ये पांच यम हैं।
2.      नियम- स्वच्‍छता, सन्‍तुष्‍टि, तपस्‍या, अध्‍ययन, भगवान को आत्‍मसमर्पण ये पांच नियम हैं।
3.      आसन- ‘स्‍थिरं सुखं आसनम्’ अर्थात स्‍थिर और सुखपूर्वक बैठने की क्रिया ही आसन है।
4.      प्राणायाम- अपनी सांसों को नियमित करने की क्रिया ही प्राणायाम है।
5.      प्रत्‍याहार- बाहर की चीजों से मन को हटाना।
6.      धारणा- एक ही लक्ष्‍य पर ध्‍यान लगाना।
7.      ध्‍यान- ध्‍यान जिस पर केन्‍द्रित है, उसका चिंतन।
8.      समाधि- ध्‍यान को चैतन्‍य में विलय करना।
किसी ने सच ही कहा है– दवाइयां केवल आए हुए रोगों को खत्‍म करती हैं, किन्‍तु योग आरोग्‍य प्रदान करता है जिससे रोग फैलाने वाले कीटाणु पास ही नहीं आते। इसीलिए योग सबसे बडी ओषधि है।


नागरीप्रचारिणी सभा

नागरीप्रचारिणी सभा, हिन्दी भाषा और साहित्य का प्रचार और प्रसार करने वाली देश की अग्रणी संस्था है। 1893 में वाराणसी में 'काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई, इसमें भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी और रामचंद्र शुक्ल जैसे विद्वानों ने हिन्दी भाषा के सर्वांगीण विकास के लिए बहुत कार्य किया। इनमें कहानीकारों में मुंशी प्रेमचंद प्रमुख थे तो नाटककार के रूप में पंडित जयशंकर प्रसाद अग्रणी । कवियों में ‘हरिऔध’, 'मैथिलीशरण गुप्त', 'सूर्यकांत मणि त्रिपाठी निराला', 'महादेवी वर्मा' आदि प्रमुख थे।
डॉ. श्यामसुदर दास, नागरी प्रचारिणी सभा काशी के तीन संस्थापकों में अन्यतम थे। इस कार्य में उनके सहयोगी पं. राम नारायण मिश्र तथा ठाकुर शिव कुमार सिंह रहे। इस पुनीत कार्य में बाबू गदाधर सिंह ने अपने दुर्लभ ग्रंथों का संग्रह आर्य भाषा पुस्तकालय 'काशी नागरी प्रचारिणी सभा' को सौंप दिया था, जो आज भी इसी नाम से जाना जाता है।
काशी की नागरीप्रचारिणी सभा का ध्यान आरंभ में ही इस बात की ओर गया कि सहस्रों हस्तलिखित हिन्दी पुस्तकें देश के अनेक भागों में, राजपुस्तकालयों तथा लोगों के घरों में अज्ञात पड़ी हैं। अत: सरकार की आर्थिक सहायता से उसने सन् 1900 में पुस्तकों की खोज का काम हाथ में लिया और सन् 1911 तक अपनी खोज में आठ रिपोर्टों में सैकड़ों अज्ञात कवियों तथा ज्ञात कवियों के अज्ञात ग्रंथों का पता लगाया। है।


योग

आज लगभग सभी लोग योग शब्द से परिचित हैं, कुछ इसे योग के नाम से जानते हैं तो कुछ योगा। योग से योगा तक का सफर बहुत लम्बा है। हमारे देश का योग पश्चिमी देशों में इस कदर फैला और पसन्द किया गया कि रामा और कृष्णा की तरह योग भी योगा हो गया। हम भारतीयों की प्रायः यह आदत है कि जब तक कोई विदेशी हमारी चीज को अच्छा नहीं कह देता तब तक हम उसे अच्छा नहीं मानते। इसी आधार पर देखते ही देखते हम भी योगा की ओर बढ़ गये। आज ‍घर-घर में लोग योग से किसी न किसी रूप में परिचित हैं, सुबह–शाम पार्कों में और घरों की छत पर लोग आसन या प्राणायाम करते हुए देखे जा सकते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में भारत में योग का चलन तेजी से बढ़ा है। लोग अब अपने स्वास्थ्य के प्रति पहले से अधिक जागरूक हो गए हैं। भारत की पहल पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2015 में एक महत्त्वपूर्ण निर्णय लेते हुए 21 जून को अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया । इस वर्ष भी विश्व के लगभग 190 देशों में योग के  विविध कार्यक्रम आयोजित किए गए जिसमें करोड़ो लोगों ने बढ–चढकर भाग लिया।
अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस हेतु 21 जून की तिथि को चुनने के पीछे वैज्ञानिक और पारंपरिक दोनो ही कारण हैं। खगोलशास्‍त्री ऐसा बताते हैं कि सूरज दो तरह से गति करता है- उत्तरायण और दक्षिणायन। जून महीने की 21 तारीख को ही सूरज अपनी गति बदलता है, यानी उत्तरायण से दक्षिणायन में परिवर्तित होता है। यह एक प्राकृतिक परिवर्तन है। जब सूरज दक्षिणायन में आता है तो सूरज की गर्मी और प्रकाश में भी कमी आ जाती है। इससे पृथ्वी के एक भाग पर अनेक प्रकार के रोगाणु सक्रिय हो जाते हैं और रोग फैलने की संभावना प्रबल हो जाती है। योग का स्‍वास्‍थ्‍य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए अपने शरीर और मन को स्वस्‍थ रखने के लिए योगाभ्‍यास बहुत जरुरी है। यही वजह है कि इस मौसम परिवर्तन के पहले दिन को ही अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में चुना गया।

किसी ने सच ही कहा है– ‘Precaution is better than cure’, दवाइयां केवल आए हुए रोगों को खत्‍म करती हैं जबकि योग पूर्ण आरोग्‍य प्रदान करता है जिससे रोग फैलाने वाले जीवाणु पास ही नहीं आते। इसीलिए योग सबसे बडी ओषधि है।