कुंभ पर्व
भारत सिर्फ एक जमीन के टुकडे़ का
नाम नहीं है। यह नाम है, हमारी प्राचीन परम्पराओं का, हमारे समृद्ध इतिहास का,
हमारी विविधता का और इसमें बसी एकता का।
भारत में हर राज्य की अपनी अनूठी
परम्पराएं हैं, अपने त्योहार हैं लेकिन ये सभी त्योहार हमें आपस में जोड़ते हैं।
इन्हीं में से एक है कुंभ। प्रायः सभी भारतीय इस नाम से परिचित हैं। किन्तु बहुत
कम लोग यह जानते हैं कि यह क्यों मनाया जाता है तथा इसके पीछे क्या इतिहास है?
हमारे देश में 4 कुंभ मनाये जाते
हैं। पुराणों में इसके बारे में एक कहानी मिलती है। क्षीरसागर में मन्थन के समय जब
अमृतकलश निकला तो उसे पाने के लिए देवताओं और असुरों में छीना–झपटी होने लगी। इसी
बीच भगवान विष्णु मोहिनी के रूप में आकर घडे़ को लेकर वहाँ से ले जाने लगे। इसी
भाग–दौड़ में घडे़ में से अमृत की कुछ बूंदें छिटककर चार अलग-अलग स्थानों पर आ गिरीं।
ये स्थान हैं–
·
उज्जैन
·
हरिद्वार
·
इलाहाबाद
·
नासिक
आज इन्हीं चार स्थानों को तीर्थ
मानकर कुंभ का आयोजन किया जाता है।
इतिहास की दृष्टि से देखें तो
छठी सदी के आसपास चीनी यात्री ह्वेंसांग ने भारत भ्रमण करने के बाद जो यात्रा-विवरण
लिखा है, उसमें भी कुंभ का वर्णन मिलता है।
संस्कृत में अन्तरिक्षविज्ञान और
ज्योतिष के ग्रन्थों में कुंभ की वैज्ञानिकता का वर्णन मिलता है। विज्ञान के
अनुसार बृहस्पति और सूर्य की स्थिति के आधार पर ही कुंभ का निर्धारण होता है। कुंभ
का आरम्भ पूर्णिमा तिथि से होता है। दो कुंभ के बीच प्रायः 3 वर्षों का अन्तर होता
है।
हरिद्वार और इलाहाबाद में मनाया
जाने वाला कुंभ अर्धकुंभ कहलाता है। नासिक और उज्जैन में पूर्णकुंभ मनाया जाता है,
इसे ही महाकुंभ भी कहते हैं।
ग्रह और नक्षत्रों की अवस्था का
सीधा प्रभाव हमारे वायुमंडल और जल पर पड़ता है। ग्रहों की स्थिति से जल पर पड़ने
वाली सूर्य की किरणें विशेष प्रभाव डालती हैं। इसीलिए कुंभ में स्नान का विशेष
महत्त्व है।
स्नान–
कुंभ में स्नान की भी एक विशिष्ट
परम्परा है जो प्राचीन सन्तों की बनाई हुई है। इसमें सर्वप्रथम स्नान का अधिकार
साधु संन्यासियों को है। साधु संन्यासियों की परंपरा में 10 अखाडे प्रसिद्ध हैं।
ऐसा माना जाता है कि आदि शंकराचार्य ने सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए इन अखाडों
की स्थापना की थी।
पिछले वर्ष ही मध्यप्रदेश के
उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ का आयोजन किया गया। इसमें पवित्र शिप्रा नदी में स्नान
करने की परंपरा है।
इतनी महत्त्वपूर्ण खगोलीय स्थिति
को लेकर भारत के अलावा अन्य किसी देश में शायद ही इस तरह का कोई पर्व मनाया जाता
हो।
