स्वामी
दयानन्द सरस्वती का जन्म 12 फरवरी, 1824 को गुजरात के टंकारा जिले में हुआ। इनका
नाम बचपन में मूलशंकर था । इनके पिता कर्षण जी पेशे से कलेक्टर थे और माँ
यशोदा बाई गृहिणी थी । मूलशंकर ने 12 वर्ष की आयु तक घर में रहकर ही पिता से
शिक्षा प्राप्त की।
स्वामी
जी के जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिनके कारण उन्होंने सामाजिक मान्यताओं पर
प्रश्न करना शुरू कर दिया। अपनी छोटी बहन और सबसे ज्यादा प्यार करने वाले अपने
चाचा की हैजे के कारण मृत्यु देखने के बाद वे बचपन में ही अंदर तक टूट गए और जीवन
के इस भयावह सत्य को जानने के लिए व्याकुल हो उठे। उनके प्रश्न और कठिन हो चले थे,
जिनका उत्तर उनके माता–पिता भी न दे पाते थे। अन्त में पिता ने आस्था का मार्ग
खोजा और मूलशंकर को शिवशंकर का महत्त्व समझाया और शिवरात्रि पर व्रत करने को कहा।
मूलशंकर ने सोचा कि शिवरात्रि पर शिव को प्रसन्न करके उन्हीं से प्रश्नों का उत्तर
मांगूंगा। उन्होंने शिवरात्रि में पिता के साथ सारी तैयारियां करवायी और व्रत भी
रखा। जैसे–जैसे रात नजदीक आई, बालक की उत्सुकता और बढ़ती गई। रात को मन्दिर में
भजन–कीर्तन होने लगे। लगभग एक पहर बीत जाने के बाद सब धीरे–धीरे सोने लगे, पर
मूलशंकर की उत्सुकता कम नहीं हुई। वो जाप करते हुए शिव के प्रकट होने की प्रतीक्षा
कर रहे थे, कि तभी उन्होंने देखा कि मन्दिर के एक कोने से कुछ चूहे निकलकर आए और
मन्दिर में उत्पात मचाने लगे। शिवलिंग पर चढ़कर मलमूत्र किया और लगाया हुआ भोग भी
सारा खराब कर दिया। यह देख मूलशंकर से रहा न गया। उन्होंने झट से पिता को उठाकर
पूछा कि ‘पिता जी, क्या सच में यही सच्चा शिव है, जो स्वयं अपनी रक्षा भी नहीं
कर पा रहा।’
पिता
ने बालक को डांटते हुए चुप करा दिया। लेकिन ये बात मूलशंकर के मन में बैठ गई कि वो
सच्चे शिव को खोजकर रहेंगे।
कुछ
समय बाद अवसर देखकर मूलशंकर घर से निकल भागे और मठ–मन्दिरों में घूम–घूमकर शिव की
खोज करते रहे। इस दौरान एक मन्दिर में स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती ने उन्हें
संन्यास की दीक्षा देकर स्वामी दयानन्द सरस्वती नाम प्रदान किया।
कई
वर्षों तक ज्ञान की खोज में भटकने के बाद एक दिन वे मथुरा पहुंचे। मथुरा में
स्वामी दयानन्द ने विरजानन्द दण्डी से भेंट कर अध्ययन की इच्छा प्रकट की। विरजानन्द जी ने उन्हें शिष्य के रूप में
स्वीकार कर 3 वर्ष तक शिक्षित किया। वेद, उपनिषद्, दर्शन आदि की शिक्षा पूरी करने
पर जब स्वामी दयानन्द ने गुरुदक्षिणा देनी चाही तो विरजानन्द जी ने समाज हित में
उनका जीवन ही मांग लिया। स्वामी दयानन्द ने सहर्ष ही गुरू का यह आदेश स्वीकार कर
लिया। वे पूरे देश में घूम घूमकर वैदिक धर्म का प्रचार करने लगे और लोगों को समाज
में व्याप्त कुरीतियों से सावधान करने लगे।
स्वामी
दयानन्द की मान्यता थी कि वेद ईश्वरीय ज्ञान है और हम सबको वेदों के अनुसार ही
जीवन जीना चाहिए। उन्होंने समाज को एक नारा दिया – ‘वेदों की ओर लौटो।’
स्वामी
दयानन्द समाज में एक क्रान्ति बनकर सामने आए। उनका चिन्तन धर्म तक ही सीमित नहीं
था, बल्कि उन्होंने भारत की आजादी के लिए भी लोगों को प्रेरित किया। स्वामी जी के
प्रवचनों ने देश की आजादी में नींव का काम किया। स्वामी जी की प्रेरणा से ही लाला
लाजपत राय, विनायक दामोदर सावरकर, श्यामजी कृष्ण वर्मा और रामप्रसाद बिस्मिल जैसे
क्रान्तिकारियों ने देश के लिए अपनी कुर्बानी दी। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने
उन्हें ‘आधुनिक भारत का निर्माता’ कहा है।
शिक्षा
के क्षेत्र में स्वामी जी का योगदान अविस्मरणीय है। स्वामी जी की प्रेरणा से ही
लाला हंसराज ने लाहौर में डीएवी (दयानन्द एंग्लो वैदिक) का̆लेज की स्थापना की। भारत
की प्राचीन शिक्षा परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए स्वामी जी के शिष्य
श्रद्धानन्द सरस्वती ने हरिद्वार में गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना की। इस प्रकार
प्राचीन और आधुनिक दोनों ही शिक्षा पद्धतियों के संवर्धन में स्वामी जी का योगदान
अमूल्य है।
शिक्षा
और धर्म के प्रचार के लिए स्वामी जी ने सन् 1875 में मुंबई में आर्यसमाज की
स्थापना की। समाज को बौद्धिक विरासत देने के लिए उन्होंने ‘सत्यार्थ प्रकाश’
जैसे अमर ग्रन्थ का प्रणयन किया। इस पुस्तक में प्रश्नोत्तर शैली में 14 अध्यायों
(समुल्लास) में धर्म, दर्शन, ईश्वर जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई है।
इसमें 3000 से ज्यादा संदर्भ दिए गए हैं, जिसके कारण यह पुस्तक स्वयं में एक बड़े
शोध ग्रन्थ से कम नहीं है।
स्वामी
दयानन्द जहाँ भी जाते, लोग उनके व्याख्यान के दीवाने हो जाते थे। लेकिन प्रसिद्धि
अपने साथ शत्रुओं को भी जन्म देती है। राजस्थान के जोधपुर में एक वेश्या ने उनके
रसोइए के साथ मिलकर उन्हें जहर दे दिया और सन् 1883 में दीपावली के दिन स्वामी जी इस
धरा को छोड़कर चले गए। उनके अन्तिम शब्द थे– ‘प्रभु, तूने अच्छी लीला की। तेरी
इच्छा पूर्ण हो’।
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