Monday, 20 February 2017

जयदेव और उनकी अमर कृति गीतगोविन्द

जयदेव और उनकी अमर कृति गीतगोविन्द
उडीसा राज्य में साहित्य की परंपरा अत्यन्त समृद्ध है, उडीसा के अनेकों कवियों ने अपनी लेखनी से महाकाव्य, नाटक, उपन्यास और गीतिकाव्य की रचना करके साहित्य को संवर्धित किया है, विशेषतः संस्कृत साहित्य को । यहाँ के प्रमुख कवियों में जयदेव का स्थान विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
जयदेव
कवि जयदेव का समय लगभग ईसा की बारहवी सदी है। उडीसा के विद्वान के.एन. महापात्र और सिद्धेश्वर हाट के अनुसार जयदेव का जन्म भुवनेश्वर के समीप किन्दुबिल्व या केन्दुली नामक स्थान पर हुआ। इनके पिता का नाम भोजदेव और माता का नाम राधादेवी था। इतिहास की दृष्टि से ये उडीसा के गजपति राजाओं के समकालीन थे। इनकी कृतियों के आधार पर इन्हें एक वैष्णव भक्त और सन्त कहा जाता है।
जयदेव ने अपने विषय में कभी कुछ नहीं लिखा अतः जयदेव के जीवन को जानने के लिए किंवदन्तियों का ही आश्रय लेना पडता है । उडीसा में जहां जयदेव का जन्म हुआ था वह जगह आज भी एक महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थान है , वहां माघ की संक्रान्ति पर साल में एक बार मेला लगता है और साधु संतो का समागम होता है लोग कहते हैं कि माता–पिता की मृत्यु के बाद जयदेव देश भ्रमण पर निकल गये। वे मथुरा वृन्दावन गये और राधा–कृष्ण की प्रचलित कथाएं सुनीं। उसके बाद वे जगन्नाथपुरी आ गए। पुरुषोत्तम क्षेत्र (पुरी) पहुंचकर जयदेव ने जगन्नाथ के दर्शन किये और एक विरक्त संन्यासी की तरह वृक्ष के नीचे रहकर भगवान का भजन-कीर्तन करने लगे। उनके वैराग्य से प्रेरित होकर, वहां अन्य बड़े संत-महात्माओं का सत्संग होने लगा।  
जयदेव के विवाह के बारे में भी एक किंवदन्ती प्रसिद्ध है। जयदेव का विवाह पद्मावती नामक कन्या से हुआ था। कहते हैं,  जगन्नाथ पुरी में देवशर्मा नाम का एक ब्राह्मण पत्नी सहित भगवान् पूजा के लिए आया। उसने भगवान से सन्तान मांगी और ये भी कहा कि वो सन्तान आजीवन जगन्नाथ जी की सेवा करेगी। कुछ समय बाद उसके यहाँ कन्या का जन्म हुआ। जिसका नाम पद्मावती रखा गया। पद्मावती बहुत सुन्दर थी। जब वह विवाह योग्य हुई तो कन्या के पिता को स्वप्न में भगवान जगन्नाथ ने जयदेव के साथ पुत्री के विवाह का आदेश दिया। भगवान् का आदेश मानकर देवशर्मा ने पुरी में जाकर जयदेव को अपनी कन्या का हाथ सौंप दिया। जयदेव विवाह के लिए इच्छुक नहीं थे किन्तु पद्मावती बोली कि मैं अब आपकी दासी हूँ, आप चाहें तो मुझे साथ रखें या मेरा परित्याग करें लेकिन मैं तो आपकी दासी बनी रहूंगी। यह सुनकर जयदेव ने विवाह तो कर लिया किन्तु गृहस्थ होकर भी संत का जीवन जीते रहे।
जयदेव की रचनाएं
कवि जयदेव के नाम से १ साहित्यिक कृति उपलब्ध होती है, जिनमें  राधाकृष्ण की शृंगार रस से परिपूर्ण भक्ति का भव्य वर्णन प्राप्त होता है।  जयदेव के राधाकृष्ण सर्वत्र एवं पूर्णत: निराकार हैं। वे शाश्वत चैतन्य-सौन्दर्य की साक्षात अभिव्यक्ति हैं। अपनी काव्य रचनाओं में जयदेव ने राधाकृष्ण की व्यक्त, अव्यक्त, प्रकट और अप्रकट  सभी तरह की लीलाओं का भव्य वर्णन किया है।
जयदेव की अमर कृति का नाम है गीतगोविन्द। यह ग्रन्थ पूरे भारत में प्रसिद्ध है। संस्कृत भाषा का जैसा प्राञ्जल रूप इसमें दिखाई पडता है वैसा स्वभावमधुर ब्रजभाषा के अलावा कहीं और नहीं दिखाई देता। इसी कृति के कारण जयदेव आज भी संसार में अमर हैं।
गीतगोविन्द का परिचय निम्नलिखित है।
गीतगोविन्द
गीतगोविन्द काव्य में १२ सर्ग हैं। प्रत्येक सर्ग में २ प्रबन्ध हैं, इस प्रकार पूरा ग्रन्थ २४ प्रबन्धों (खण्डों) में विभक्त है। इसमें कृष्ण की रासलीला, राधा और कृष्ण के मिलन–विरह तथा पुनर्मिलन को कोमल व लालित्यपूर्ण गीतों में बाँधा गया है।
गीतगोविन्द एक विशुद्ध साहित्यिक रचना है वस्तुतः श्रीमद्भागवत के बाद गीतगोविन्द ही पहला ऐसा साहित्य है जो राधाकृष्ण की लीला की अनुपम अभिव्यक्ति करता है। गीतगोविन्द के रूप में जयदेव ने संस्कृत में मधुरतम गीतों की रचना की है। इन गीतों को अष्टपदी कहा जाता है। वैष्णव लोग इन गीतों को भक्तिरस का शास्त्र कहते हैं। जयदेव ने गीतगोविन्द के माध्यम से न केवल समाज को राधा और कृष्ण की सरस लीलाओं से परिचित कराया बल्कि अपने वर्णन के सौन्दर्य से पढने वालों के हृदयों को भी आनंद से विभोर कर दिया। इसमें कवि की कृष्ण के प्रति भक्ति, संगीत में प्रवीणता, ज्ञान और शृंगार की अपनी बेहतरीन समझ स्पष्ट परिलक्षित होती है।
ऐसा कहा जाता है कि जयदेव जब मथुरा वृन्दावन की यात्रा कर रहे थे तब कृष्ण की रासलीला को देखकर उनका मन अत्यन्त प्रफुल्लित हुआ और इस आनन्द की अभिव्यक्ति के लिए ही उन्होनें गीत गोविन्द की रचना की।
वे स्वयं कहते हैं–
यदि हरिस्मरणे सरसं मनो यदि विलासकलासु कुतूहलम् ।
मधुरकोमलकान्तपदावलीं शृणु तदा जयदेवसरस्वतीम् ।।
अर्थात्
जिनकी रुचि हरि स्मरण में है, जिन्हें प्रभु की प्रेम लीला में आनन्द प्राप्त होता है। वे गीतगोविन्द काव्य का रसपान कर सकते हैं।

गीतगोविन्द में राधा और कृष्ण के प्रेम की कहानी काव्य के मनोहारी छंदों में वर्णित है। इसमें केवल तीन चरित्रों का चित्रण है- राधा, कृष्ण और राधा की एक सखी, जो इन दोनों के पास एक-दूसरे का संदेश पहुंचाती है। कवि ने इनके जिस प्रेम का वर्णन किया है, वह सांसारिक नहीं, अलौकिक है।
गीतगोविन्द वस्तुतः एक गीतिकाव्य है जिसमें एक ओर तो प्रत्यक्ष रूप से कृष्ण और राधा की प्रेम लीलाओं का नाटकीय निरूपण किया गया है तथा दूसरी ओर गम्भीरता से अध्ययन करने पर यह परमात्मा के साक्षात्कार के लिए आत्मा की व्याकुलता और अन्त में स्वयं को परमात्मा में लीन कर देने का भावों का ही चित्रण है। यह ग्रन्थ पाठक को शृंगार और ईश्वर के साक्षात्कार दोनों ही प्रवाहों में बहाने के लिए पर्याप्त है।
आज भी मन्दिरों में और विभिन्न नृत्य नाटिका के मंचों पर बडे उत्साह और श्रद्धा से उन गीतों का गायन किया जाता है। गीतगोविन्द के संगीत का प्रभाव कवियों, संतों और चित्रकारों पर भी देखा गया है। जम्मू और कांगडा में बसोहली शैली के चित्र इसी पर आधारित हैं। हिन्दी साहित्य के भास्कर ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र’ ने भी गीतगोविन्द को अपनी लेखनी का विषय बनाया है, उन्होनें इस साहित्य का हिन्दी पद्यानुवाद किया है।
कवि का शब्दचयन सच में अद्भुत है। इस ग्रन्थ का महत्त्व इस बात से स्पष्ट होता है कि लगभग ४० से ज्यादा विद्वानों ने इस ग्रन्थ की टीका अर्थात् व्याख्या की है। इस ग्रन्थ का अनुवाद भारत की प्रायः सभी भाषाओं के साथ–साथ कुछ यूरोपीय भाषाओं में भी हुआ है।

हिन्दी के प्रसिद्ध कवि विद्यापति पर गीतगोविन्द का या कहें तो विशेष रूप से जयदेव की शृंगार भावना का प्रभाव स्पष्ट दिखाई पडता है।

2 comments:

  1. Very useful blog for me. Thank you 🙏🙏

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  2. मां सरस्वती को नमन करते हैं

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